कहानी
लो बजट
प्रज्ञा
‘‘संभव यार! कहां भेज
दिया तूने हम लागों को? दिन भर खाक छानी और रिज़ल्ट ज़ीरो।’’
एक पूरे दिन की
बर्बादी प्रखर को बेचैन किए जा रही थी। बल्कि उसकी बढ़ती खीज और झुंझलाहट का असली
कारण था कि पिछले कुछ महीनों से ज़ाया होते चले आ रहे दिनों में एक और दिन का
बढना़। संभव से बात करते हुए चाहकर भी प्रखर उस झुंझलाहट को दबा न सका। उसके चेहरे
से सारे मनोभावों को पहचानकर संभव ने सहानुभूति का फाया तैयार किया-
‘‘ भाई
फ्रिकमंद न हो। ये काम कोई एक-दो दिन के नहीं हैं। टाइम लग ही जाता है। इस बहाने
तू एक अच्छी रिसर्च कर रहा है अपने एरिया की, ये
तो सोच?’’
‘‘खाक रिसर्च! थकान से
भर रहा हूं। तूने कितने प्रोपर्टी डीलर्स को मेरे नम्बर दे दिए हैं? ये बद्तमीज़! न दिन देखते हैं न रात, न
ही कोई छुट्टी । बस आर्डर दे देते हैं।
‘‘सर आ जाओ फ्लैट
दिखा दूं। आपके बजट में है। हो सके तो मैडम को भी ले आना। हमारा दूसरा चक्कर बचेगा
और आपको भी फाइनल करने में कोई मुसीबत नहीं आएगी।’’
‘‘ अब
तू खुद बता वो तेरी सहूलियत देखें या तेरी सुविधा?’’ संभव
ने प्रखर को शांत करते हुए कहा।
कुछ देर कमरे में
शांति रही फिर प्रखर का स्वर गूंजा।
‘‘ पता
है तुझे ‘आपके बजट में ’-ये तीन शब्द मुझे अजगर जैसे लगने लगे हैं। एक तरफ तो इनसे
शीशे में उतारे जाने का खूब काम लिया जाता है। हमें लगता है अगला हमारी आर्थिक
हालत को समझ रहा है। हमारा बजट कम है तो उसे हमसे ज़रा हमदर्दी होगी। कर रहा होगा
हमारे लिए हमसे बढ़कर कोशिश। पर जब बात आमने-सामने होती है तो हमदर्दी भाड़ झौंकने
चली जाती है। कहते हैं-
‘‘देख लो सर जी। अब
इतने में तो ऐसा ही मिलेगा। और गुड़ डालो ज़रा, तब
स्वाद आएगा।’’
प्रखर अपनी रौ में
बोलता चला जा रहा था-‘‘हर बार हर आदमी जैसे मुझे मेरी औकात बताने लगता है। और ऐसे
जताता है जैसे मैं लो बजट कहकर कोई गटर मांग रहा हूं अपने रहने के लिए। ’’
तमाम अफसोस ,
गुस्सा और बेचैनी प्रखर को लगातार कुंठित किए दे रही थी। काम न बन पाने
की परेशानी से ज़्यादा इन दिनों गैरों से मिला अपमान उसे अपनी ही नज़रों में गिरा
रहा था। ऐसे में संभव का समझाना उसे फिजूल लगा।
संभव से मिली
सहानुभूति और हौसले में कुछ दिन बीते ही
थे कि आज फिर नयी मुसीबत खड़ी हो गई। छुट्टी का दिन था। मंजरी कितनी खुश थी और नील
गोद से उतरने का नाम नहीं ले रहा था। प्यारी छुटकी महीना भर होने के बावजूद कोई
अच्छा- सा नाम न मिलने से बेखबर बिस्तर पर खिड़की से छनकर आ रही धूप में मग्न थी।
यही है न एक सुखी जीवन की परिभाषा। यही है वो सपना जिसे हर आदमी साकार करना की चाह
रखता है और एक छत्त के नीचे ये फलता-फूलता सपना इतवार में नहाकर जरा परवान चढ़ा ही
था कि नामुराद फोन बज उठा।
‘‘सर जी नया फ्लैट
मिला है। देख लो आपके बजट में है।’’ सतिंदर नाम के उस आदमी के फोन ने सारा
इत्मीनान एकबारगी छीन लिया। वो तो मंजरी का हौसला था तो सारा काम निबटाकर इस
उम्मीद से मन बना लिया कि आज काम हो ही जाएगा। प्रखर ने उसके उत्साह पर भरोसा करके
अपनी छुट्टी दांव पर लगा दी।
जो फ्लैट उनके बजट
में था वो एक छोटी -सी सोसायटी थी। उस छोटी- सी सोसायटी में बी टाइप का, उनके बजट का फ्लैट देखकर किसी को भी उल्टी आ जाती।
‘‘कितना सड़ाकर रखते
हैं घरों को लोग? हमें देखो हम किराए के मकान को भी कितना
सुंदर बनाकर रहते हैं।’’ मंजरी अपने भावों
का रास्ता रोक न सकी।
दोनों ने महसूस
किया घर वाकई नाकाबिल- ए- बर्दाश्त था। ज़मीन पर मैल की काली, चीकट परतें देखकर जैसे ही दोनों ने सतिंदर का चेहरा देखा तो उसकी आंखें
समूचा सवाल ताड़ गईं।
‘‘ ये
तो घर बंद है न ...फिर सफेदी करवाओगे आप तो घिसाई वाले को बुलवा लेना। चकाचक हो जाएगा।
बढि़या चिप्स का फर्श है और मन न चाहे तो नए डिज़ायन की टाइलें लगवा लेना और क्या?’’
दोनों मुंह देखने
लगे एक-दूसरे का और सतिंदर के सुरसामयी बोलों पर हैरत करने लगे। अभी घर लेने में
ही कितना कर्जा लेना पड़ेगा और इसने नई टाइलों वाले फर्श की बात कैसी आसानी से कह
दी।
रसोई में कदम रखते
ही मंजरी का माथा ठनका। ये स्लैब है? इसकी ऊंचाई कितनी
कम है। मेरी गर्दन ही टूट जाएगी इतना झुककर। काम ही नहीं होगा। एक बार फिर उस लो
बजट फ्लैट ने भविष्य में आने वाली असुविधाओं का बिगड़ा चेहरा दिखा दिया।
इस बार सतिंदर बिना
सवाल के उनकी बातचीत के बीच में टपक पड़ा। ‘‘जी मालिक ने रहने के लिए नही, बेचने के वास्ते ही खरीदा था इसे। ये स्लैब तो नया पड़वाया है इसमें। अब
ठेके पर दे देते हैं लोग। इनके पास इतना टाइम कहां जो इन छोटी प्रॉपरटियों में मगज मारें। मिस्त्रियों ने बना दिया अपनी मर्जी
का।’’
प्रखर-मंजरी अभी
कुछ सोच ही रहे थे कि सतिंदर फिर बोल पड़ा-‘‘सर जी आप ले लो इसे। जाने मत दो।
स्लैब का क्या है नया लगवा लेना आप। फिर ये तो देखो लकड़ी का काम किया- कराया है
इसमें।’’
दोनों ने देखा जिस
लकड़ी के काम के इतने तूमार बांधे जा रहे थे वो अपना मुंह दिखाने लायक भी नहीं था। एक अलमारी और कुछ
शेल्फ...बस। और रसोई में जो काम हुआ था उसका सनमाईका जगह-जगह से फूला हुआ था। पल्लों को खोला तो कलई ही खुल गई। बोर्ड
पर दो सूत की प्लाई एक-दूसरे से नाराज़
विपरीत दिशाओं में भाग रही थी और उसके बीच दीमकों के धमाचौकड़ी करने का
अड्डा बना था। मंजरी ने जिस चाव से पल्ला खोला उससे दोगुने डर से भड़ाक से बंद कर दिया। सिहरन से झनझनाते शरीर को उसने
यों झटका जैसे दीमकें पल्लों से निकलकर उसके शरीर पर तैर रही हों। खींसे निपोरते
सतिंदर की आंखों ने मासूमियत से पुराने तर्क दोहरा दिए-‘‘घर सालों से बंद है और
फिर काम तो नया करवाओगे ही आप।’’ आज के दिन की निराशा को प्रखर-मंजरी साफ देख पा
रहे थे। इधर नील तो बाहर खेल में मस्त था पर धैर्य की पूरी परीक्षा दे चुकी छुटकी
जोर-जोर से रोने लगी।
लौटते समय दोनों खामोश थे पर दोनों की खामोशी
बहुत कुछ कह रही थी। मंजरी सोच रही थी कि उनकी किस्मत ही खराब है। अब कोई मकान
नहीं मिलेगा उन्हें और प्रखर गुस्से में था। ‘‘ अब कोई बात नहीं करनी किसी
सतिंदर-फतिंदर से। जो बात होगी सीधी डीलर तेजपाल से ही होगी।’’-उसने सोचा। शाम को
प्रखर, संभव के साथ डीलर तेजपाल के ऑफिस जा पहुंचा।
‘‘आओ मालकों। क्या
हाल-चाल? लगता है आज तो चीज़ पसंद आ गई आपको। तो करवाऊं
बयाना?’’ तेजपाल अपने नाम के पूवार्द्ध के समान ही बातों और
फितरत दोनों में तेज था।
‘‘बयाना? आपने मजाक बनाया हुआ है? क्यों टाइम खराब कर
रहे हो हमारा?’’प्रखर के जेनुइन गुस्से को संभव देखता रह गया।
अपनी आदत के मुताबिक वो चाहता था बातचीत का लहजा प्रखर के अनुभव की तरह तल्ख और
शिकायती न हो। पर अब तीर तरकश से निकल चुका था और लगा भी ठीक निशाने पर था। तेजपाल
की भंगिमा के साथ उसका स्वर भी बदल गया।
‘‘कैसे टाइम खराब हो
रहा आपका?’’
‘‘ आपका
आदमी एरिया के सबसे बेकार फ्लैट दिखा रहा है हमें। सैकडों नुक्स हैं उनमें। उन्हें
सुधरवाने के खर्च में तो एक नया फ्लैट ही आ जाएगा।’’ बात को अपने गुस्से के आकार
में ही प्रखर ने रख दिया।
‘‘ तो
बजट बढ़ा लो अपना और ले लो मनमाफिक चीज़।’’ सपाट आक्रामकता में तेजपाल के शब्द
गूंजे।
‘‘ बढ़ा
लें बजट? ये क्या बात हुई? हमने
तो आपको पहले ही बता दिया था कि हमारा बजट कम है और हमें उसीमें क्या-क्या
सुविधाएं चाहिए।’’ प्रखर के खदबदाते शब्दों को अपनी मुलायमियत के रंग में ढालकर और
शिकायत को डायल्यूट करते हुए संभव को बीच में उतरना ही पड़ा -
‘‘ परेशान
हो गया है ये बस। आप तो जी हल निकालो। इसके बजट में कोई ऐसी चीज़ दिलाओ कि ज्यादा
झंझट न हों। बस कोई रेडी टू शिफ्ट टाइप। सफेदी कराकर काम निकल जाए कुछ साल।’’
‘‘ रेडी
टू शिफ्ट जैसी चीज़ और इतने लो बजट में? मार्किट का अंदाजा
है आपको? अच्छी चीज़ आती बाद में है बिक पहले ही जाती है।’’
तेजपाल के इस झूठ
को भी प्रखर अपने अनुभव से साफ समझ गया था ,उससे
कहे बिना न रहा गया-
‘‘ ये
सब आप लोगों का फैलाया गया है । तीन महीने पहले जो फ्लैट दिखाया था न सतिंदर ने अब तक नहीं बिका है। पता
तो होगा ही आपको।’’ तेजपाल की परवाह न करते हुए प्रखर बोलता गया। उसे अब तेजपाल के
खेल समझ आने लगे थे। पहले कोई मंहगी, चमचमाती चीज़ दिखा
दो ग्राहक को जो उसके बूते के बाहर हो और जब सारी निराशाएं उसे कुंठित कर दें,
हीन भावना से भर दें तो अपना दांव खेलकर वही घटिया चीज़ बिकवा दो जो
बिकवाना चाहते हो।
तेजपाल को
भी अब खरीददार के रूप में प्रखर का कोई पास न रह गया था फिर अब उसके पास प्रखर के
लायक कोई विकल्प बचा भी नहीं था। संभव की पैचअप की पहल के कारण अब तक दिखाई जा रही
सहानुभूति का आखिरी चोला भी फेंककर वह पूरी तरह बेदर्दी पर उतर आया-
‘‘ आप
क्या समझ रहे हो मकान खरीदने को? इतना आसान है क्या?
फ्लैट पसंद आ भी गया तो उसके साथ रजिस्ट्री की कीमत जोड़ो। हमारे दो
परसेंट कमीशन को जोड़ो। फिर कागज बनवाई के साथ अथोरिटी से कागज निकलवाने का खर्चा
जोड़ो। और फ्लैट की ये कीमत तो हम बता रहे हैं असली कीमत तो तय होगी मालिक के साथ
टेबल पर। वो कीमत बढ़ा भी सकता है घटा भी सकता है। फिर आप उसकी चीज़ में नुक्स
निकालने वाले कौन? उसने आपकी सुविधा के लिए नहीं अपने इन्वैस्टमेंट
के लिए प्राॅपर्टी खरीदी है। बाज़ार से शर्ट अपने नाप की लाते हो न किसी और के नाप
की तो नहीं, उसी तरह मकान है बनवाना पड़ता है उसे अपने
मुताबिक। तो देख लो जो आपका बजट है न मामला उससे तीन-चार लाख ऊपर ही जानो। समझ में
आए तो ठीक वर्ना...।’’
प्रखर को तेजपाल ने
पूरी तरह नंगा कर दिया था और प्रखर ने समझ लिया इस लो बजट में उसे अपनी कोई इच्छा
रखने का भी हक नहीं। तीन महीने की पूरी मेहनत बेकार हो गई थी। कुछ देर की चुप्पी
के बाद तेजपाल की तनी हुई मुद्रा बड़ी और
मोटी-मोटी आंखों में तैरते लाल रेशे, निचले जबड़े पर
ऊपरी दांतों का भरपूर दबाव और उससे गालों पर उभर आई भयानक सख्ती को उसने महसूस
किया। उसका कद्दावर शरीर और मेज पर फैली मजबूत बांहें भी यकायक उसे भयभीत करने
लगीं। जोश में बोली गईं उसकी बातें अब बता रही थीं कि उससे कहां और कितनी चूक हो गई । उसे ध्यान आया कि हर बार बातचीत के
दौरान तेजपाल के दोनों हाथों की उंगलियां मेज पर फैली रहतीं और उनके फैलाव के नीचे
शीशे से झांकता उस एरिया का समूचा नक्शा उसकी ताकत तले दबा रहता है । सच को मजबूती
से कहने के बाद अब तेजपाल के ऑफिस से
निकलने पर खुद का कहा सच ही रीढ़ की हड्डी में झुरझुरी फैलाने लगा। महसूस हुआ कि
तेजपाल के हाथ जैसे मेज पर बैठे-बैठे उसके पहुँचने से पहले ही उसके घर में घुसकर
मंजरी,नील और छुटकी का गला दबा देंगे। कांपते कदमों और
धड़कते दिल से प्रखर ने घर की ओर कदम बढ़ाए। संभव का साथ आज निश्चित ही किसी ढाल
से कम नहीं लग रहा था। दोनों निराश कदमों से लौट आए। प्रखर के लिए उस निराश-हताश,
डरावने दिन की रात तो खत्म हुई पर बात खत्म न हो सकी।
अगले दिन उसके ऑफिस जाने से पहले
मंजरी ने फ्रिकमंद होते हुए कहा-
‘‘ अपने
बाऊजी से बात करूं क्या?’’
मंजरी को एकटक
घूरकर उसने सख्त आवाज़ में कहा-‘‘ नहीं...एकदम नहीं।’’
मंजरी चुप हो गई । प्रखर ऑफिस के लिए चल पड़ा। रोज़ की तरह हाईवे पर ‘होम
स्वीट होम’ और नए हाउसिंग प्रोजैक्ट के बड़े-बड़े होर्डिंग्स उसकी खिल्ली उड़ा रहे
थे। ऑफिस तो वो चला आया पर वहां मन नहीं
लगा। सिगरेट पीने के बहाने बाहर आया तो आरिफ दिखाई दिया। उदासी आरिफ का चेहरा ही
बन गई है जैसे। अब आरिफ में वैसी जिंदादिली नहीं थी जैसे कुछ साल पहले थी। प्रखर की आंखों
के आगे वही पुराना आरिफ घूम गया।
‘‘ बस
भाईजान अब्बा से पैसे लेकर और अपनी बचत से एक हाउसिंग प्रोजैक्ट में अपना मकान बुक
कर लिया है मैंने। सैकड़ों मकान है उसमें।’’ उन दिनों आरिफ परिंदों की तरह
उड़ता-फुदकता। कुछ दिन बाद प्रोजैक्ट शुरू भी हो गया। फिर किश्तें जाने लगीं। आरिफ
की उड़ान कुछ और मुक्त हो गई । कुछ दिन बाद ड्रा निकलने की मिठाई भी खिलाई उसने।
अब कच्चा सा ही सही उसके सपनों को एक खूंटा मिल गया था। उड़ान भी और ऊंची हो चली कि एक दिन साथ काम करने वाले सतीश ने बताया-
‘‘ सब
खत्म हो गया। आरिफ बर्बाद हो गया।’’ बात दरअसल ये थी कि हाउसिंग सोसायटी को बनवाने
वाले बिल्डर ने नवें या दसवें माले पर पैंट हाउस के नाम पर जितने लोगों का फ्लैट बुक किया था उस पैंट हाउस की परमीशन उसने ली ही
नहीं थी। अवैध निर्माण को बड़ी चालाकी से उसने छिपा लिया था। अचानक एक दिन लोगों
के सामने सच्चाई आई कि पैंट हाउस एप्रूव्ड
प्लान का हिस्सा है ही नहीं। हंगामा मच गया।
‘‘ कुछ
नहीं भाई! बिल्डर कहता है एप्रूवल ले लेगा
और नहीं भी हुआ तो हमारा जो भी रूपया मिलेगा कोई मकान तो मिल ही जाएगा उसमें।’’
आरिफ टूटा ज़रूर था पर उम्मीद अभी बाकी थी। पर कुछ दिन बाद बिल्डर भाग गया। तबसे
आज तक फ्लैट खड़े-खड़े जर्जर हो रहे हैं और कोर्ट की तय मियाद के बाद ढहा भी दिए
जाएंगें। उनके साथ ढह जांएगें सैकड़ों सपने। आज आरिफ को देखकर थोड़ा- सा संतोष
ज़रूर हुआ था प्रखर को-‘‘ कि चलो जैसा भी हूं आज इसकी तरह ठगा तो नहीं गया हूं।
जरा उदासी की धुंध है, कुछ समय की। मौसम बदलेगा तो धुंध भी झंट जाएगी।’’
कुछ समय के लिए मकान की चिंताओं से प्रखर ने
किनारा कर लिया। उसने सोच लिया छोड़ दिया जाए अब सब भाग्य पर। होना होगा तो हो
जाएगा और नहीं हुआ तो भी सड़क पर तो बैठे नहीं हैं। वैसे भी किराए के मकान क्या
बुरे हैं उसने सोचा। यहां कोई मुसीबत तो नहीं। महीने में एक ही बार पैसा देना
अखरता है पर फिर पूरे महीने का सुकून। ये सुकून धीरे –धीरे उसकी आत्मा पर ऐसा
काबिज हुआ कि उसे लगने लगा, जब तक मन चाहेगा
पड़ा रहूंगा इस मकान में और फिर निकाले जाने पर भी नहीं निकलूंगा। हाथ-पैर जोडता
रहेगा मालिक। आगे हारकर केस-फेस करेगा तो देखी जाएगी। उसने हिसाब लगाया ऐसे तो कई
साल बेपरवाह होकर कट जाएंगे फिर क्यों चिंताएं मोल लूं? इस
कांइयां विचार ने प्रखर को बड़ी राहत पहुंचाई लेकिन जबसे वो मकान के झंझट में पड़ा
था अपने आस-पास मकान से जुड़े किस्से ही दिखाई-सुनाई पड़ रहे थे। परसों ही तो,
मदर डेयरी की लाइन में खड़ा था। दूध वाले भइया कह रहे थे-
‘‘ अरे
खन्ना साहब आजकल किसी की सूरत पर न जाना। धोखेबाज हैं ये सारे। मकान का सपना
दिखाकर ठगी खूब जोरों पर है। नए तरीके से फुसलाएंगे आपको। कहेंगे, मार्किट से कम दाम का फ्लैट है
पर अभी है फांइनैंसर के पास। बेफ्रिक होकर खरीदो हम बैठे हैं न। शीशे में उतारकर,
रकम खींचकर धोखा देने में उस्ताद हो गए हैं, चोर
कहीं के। आ गए इनके झांसे में फिर तो लुटे। कह देंगे कंधे उचकाकर पता नहीं
फांइनेंसर कहां गायब है? अब न आप फांइनेंसर
को जानो, न पास में पक्के पेपर। भटकते फिरो दरबदर।’’
‘‘ भइया
इतना ही नहीं ये फर्नीश्ड फ्लोर का भी बड़ा गोरखधंधा चल पड़ा है। कम कीमत का फ्लोर
पूरी टीम-टाम से बिकवाया जाता है। उसमें न धूप, न
हवा। साथ वाले मकान से सटा। कोई खिड़की नहीं।
घटिया माल लगाकर फर्नीचर, एल.ई.डी. फ्रिज,
वाशिंग मशीन के सामानों से आंखों पर पर्दा डाल देते हैं। हरामखोर,साले बताते हैं -‘देखिए कितना बड़ा एरिया है बारह सौ स्केवेयर फीट का।’
बाल्कनी और झज्जे घेरघार के कर देते हैं आठ सौ का बारह सौ। बाद में पकड़े जाने पर
कमरा टूटे या झज्जा टूटे इनकी बला से।’’ खन्ना साहब की इन्र्फोमेंशन ने प्रखर के
होश उड़ा दिए। उसे लगने लगा कि आज मकान का सपना कितना बड़ा हो गया है आदमी के लिए
और बाज़ार इसी कमजोरी का अपनी पूरी निर्ममता से फायदा उठा रहा है। उसने शहर का
पूरा नक्शा ही बदल दिया है। बाज़ार का अनियंत्रित विस्तार कितने घरों को लील चुका
हैं। घरों में दुकानें, शोरूम्स धड़ल्ले से चल रहे है। नक्शे के साथ
मोहल्ले का शांत मिजाज़ भी कबका खत्म हो चला है। बाज़ार है कि बंद होना नहीं चाहता
घर है कि बाज़ार की हदों में सिकुड़-सिमटकर अपना घरपन खो बैठा है। एक बड़ी
गिरोहबंदी में सभी तरह के खेल चल रहे हैं। पर आखिर कब तक? खबर
का बाज़ार भी तो गरम ही है कि इन छोटे धंधे वालों की भी ज़्यादा दिन तक खैर नहीं।
घर को ही रोज़गार बना चुके इन लोगों से जैसे ही रोज़गार छिनेगा, घर भी तो छिन जाएगा। फिर दुनिया के बड़े बाजार के दंभ के आगे इस छोटे
बाज़ार की औकात ही क्या है? इस विचार के कौंधते
ही प्रखर को ये दुकानदार अपने जैसे लो बजट वाले ही लगने लगे, अपनी तमाम आपत्तियों के बावजूद। उफ... कभी-कभी प्रखर सोचता कि मंजरी के
बाऊजी के से बात कर ही लूं क्या? फिर उसका स्वाभिमान
सर उठाता और खुद को पूरी हिकारत से झटककर वह खुद को सावधान करता।
ऐसे ही उधेड़बुन में कई दिन गुजर गए। प्रखर को लग रहा था कि क्या बुरा है
किराए के मकान में जिंदगी गुजारना? कम से कम वो सुखी
तो है। पर उसके अपने ही आदर्शों की रोज़
हत्या होती और हत्यारा कोई और नहीं प्रखर खुद ही होता। मकान का सपना उसके पीछे
पड़ा रहता और लो बजट उसे चैन न लेने देता। उसे लगने लगा था मकान के चक्करों में
आधी जनता लुट रही है और बाकी आधी लूटने के नए-नए तरीके ईजाद कर रही है। कहां जाए
वो? मकान उसका सपना था और बजट हकीकत। ऐसे में एक दिन ऑफिस
से लौटते हुए उसकी नज़र एक नये होर्डिंग पर पड़ी। ‘अल्ट्रा ग्रीन’ नाम से एक नामी
बिल्डर का प्रोजैक्ट था। मन की सूखी शाख जैसे फिर हरी हो चली। घर आकर उस प्रोजैक्ट
का ब्रोशर उसने डाउनलोड किया। बिल्डर के कई पुराने प्रोजैक्ट्स की रिसर्च की और
उसकी विश्वसनीयता से आश्वस्त हुआ। सबसे अच्छी बात तो ये थी कि शहर की भीड़-भाड़ से
भले ही दूर था हाउसिंग प्लैन पर कम कीमत में अधिक एरिया और कंस्ट्रेक्शन भी एकदम
नया था।
सारी छानबीन के बाद जब प्रखर मुक्त हुआ तो
दुनिया ही बदली हुई लगी। मंजरी का चेहरा आज उसे अधिक कोमल और सुंदर लगने लगा।
कितने दिनों बाद आज उसके चेहरे पर बालों से खेल रही हवा को निहारा था प्रखर ने।
कितने दिनों बाद उसके मन ने कहा चल जरा बच्चों के साथ बच्चा बनकर खेल ले। कितने
दिनों बाद इच्छा जगी कि उठाए संभव को और निकल पड़े बेमकसद, अंतहीन
सड़कों की ओर। न जाने कबसे ये सब स्थगित पड़ा था प्रखर की जिंदगी में। मंजरी को अभी सब बताना ज़रा जल्दबाजी थी
फिर इस बार वह कोई पक्की खबर ही देना चाहता था वह मंजरी को। पर संभव से बात किए
बिना रहा नहीं गया।
‘‘ यार
कल साथ चलेंगे...एक से दो भले।’’
‘‘ प्रखर
अगर सब जंच गया तो क्यों न दोनों साथ ही खरीद लें मकान। अच्छा पड़ोस और पड़ोस में
अच्छा दोस्त तकदीर वालों को ही मिलता है। फिर न कहना मैंने कहा नहीं।’’
‘‘ अच्छा
और संभव? वो तो मैं हूं साले जो तुझ जैसे डरपोक और पिद्दी
से निभा रहा हूं।’’ हवा में घुलते प्रखर के ठहाके ने न जाने उसके कितने दिनों के
तनाव को झाड़कर उसे मुक्त कर दिया।
‘‘मैंने भी पढ़ा है
इसके बारे में यार। पहली बात तो फ्लैट के साथ काफी खुला एरिया मिलेगा हमको। हवा,
धूप का सच्चा सुख। ऊपर से बिजली पानी की भी कोई प्राब्लम नहीं है। और
कितनी और सुविधाएं हमारे बजट में। पता है फ्लैटों के साथ कम्युनिटी हॉल भी बनेगा। बस यार बच्चों की शादियां आसानी से
निबट जाएंगीं। क्यों?’’
संभव मकान की
काल्पनिक तस्वीर में सच्चे रंग भरने लगा और प्रखर भी संभव की बात पर पुरानी कहावत‘
सूत न कपास कोरियों में लट्ठम लट्ठा ’ पर
मन में हंसते हुए अपनी कल्पना को अपने रंगों से हसीन बनाने लगा।
अगला दिन योजना के अनुरूप ही शुरू हुआ। लगभग
महीना भर पहले पड़ी जोरदार बारिश की तरह इधर दो दिन से बरस रहे आसमान से दोनों को
मौसम सुहाना लग रहा था। दोनों दोस्त संभव की सेंकेड हैंड गाड़ी में रवाना हुए अपनी
उम्मीद के घोंसले की ओर। प्रखर और संभव दोनों को लग रहा था कि अपनी पत्नियों को भी
इस रोमैंटिक मौसम में साथ ले आते, लांग ड्राइव के साथ
एक पिकनिक- सी हो जाती। दोनों इश्किया गाने गुनगुनाते बढ़ने लग। पर जैसाकि होर्डिंग दिखा रहा था कि ‘अल्ट्रा
ग्रीन’ शहर से थोड़ी दूरी पर ही है लेकिन
वो काफी अंदर की तरफ था। मीलों फैली वीरानी और खेतों के बीच से रास्ता गुजर रहा
था। कोई पक्की सड़क भी नहीं। दूर से ही रंगबिरंगी झंडियों और होर्डिंग्स ने बता
दिया कि दोनों ठीक रास्ते पर हैं। प्रखर की सहज बुद्धि ने भांप लिया कि प्रोजैक्ट
की जमीन कई खेतों को हथियाकर खरीदी गई है। सिकुड़ते खेत और फैलते मकानों के सपने
के बीच विकास गाथाओं के सारे सच सामने थे। शहर से लगे देहातों को समृद्धि का सपना
भी कबसे बेचा ही जा रहा था।
‘अल्ट्रा ग्रीन’ के ऑफिस मे सब
बातों को विस्तार से जानने के बाद दोनों आश्वस्त हुए। सारी बातें आईनें की तरह साफ
थीं। पूरा प्लैन, नक्शा, किश्तों का ब्लू
प्रिंट सामने था। बुकिंग कराने का पैसा तो दोनों नहीं लाए थे पर मन पक्का ही हो
गया था। उस ऑफिस से बाहर निकलकर कुछ देर
गाड़ी के पास ही दोनों ने अपने निर्णय पर दुबारा विचार किया। सारी स्थितियां
भरोसेमंद थीं पर कहीं कुछ खटकने लगा। सबसे पहले दूरी। शहर से इतनी दूर इस विराने
में कैसा होगा जीवन? काम से लौटकर क्या इस घर में इत्मीनान का सुख उठा
पांएगे या सारी जिंदगी सड़कों पर दूरी नापने में ही बीत जाएगी? दूसरी चिंता भी संग चली आई- अभी तो यहां कुछ भी नहीं, मकान खड़े होते-होते पांच-छह साल का समय तो लग ही जाएगा। ऐसे में किराया
और किश्त का संतुलन कैसे बैठेगा? मान लो बैठ भी गया
तो यहां मकान का नक्शा तो पास है पर किसी स्कूल, कॉलेज
और अस्पताल का नक्शा भी पास है या नहीं?
कोई पक्की सड़क भी नहीं। बाज़ार तो हर जगह पहुंच ही जाता है पर अन्य
सुविधाओं का क्या? ‘जंगल में मंगल’ मुहावरे में ही सुहाना लगता है असली जिंदगी में नहीं। चलो
परे हटाओ ,सबसे जूझते यहां आ भी गए तो क्या गारंटी है कि
पड़ोस भी मिलेगा? हो सकता है शहर के धन्ना सेठों ने इन्वैस्ट करने
के इरादे से यहां भी बुकिंग करा दी तो कौन रहेगा इस सुनसान में? शहर के किनारे ऐसे कितने हाउसिंग प्रोजैक्ट्स वीरान पड़े हैं उसी तरह
कहीं ये भी...। कितना अच्छा रहता यदि इंसान के मन के कोने में संशय घर न बनाता तो
आज सब पक्का हो ही जाता। दोनों के जीवन में एक शुरूआत हो जाती तो जीवन की बड़ी
जिम्मेदारी पूरी होती। सारे पहलुओं पर गौर करने के बाद प्रखर और संभव के सपने
बेरंग हो गए। हौसले फिर पस्तहाल हो गए और चेहरों पर नहाया- सा उत्साह न जाने ऐसी
गर्त में समा गया कि उसके निशां भी ढूंढे से नहीं मिले।
कुछ देर दोनों वहीं खड़े रहे। संभव की निराशा अपने चरम पर थी तो प्रखर
एकदम खामोश। दूर तक फैले खेतों को आंखों के थकने की हद तक निहारा उन्होंने । प्रखर
के दिमाग में अनेक तंरगें उठ-गिर रहीं थीं। मंजरी के पिता से आर्थिक मदद लेकर मकान
की समस्या हल करना कोई मुश्किल बात नहीं थी। आजकल बच्चे साधिकार हिस्सा मांगते हैं
,फिर भाई की जगह बहन मांग ले तो क्या बुरा है?
पर सारी दिक्कत उसके अपने उसूलों की ही थी। मन में ये भी आ रहा था कि
संभव जैसे भी तो अनेक हैं जिनके पास सहूलियत के कोई विकल्प नहीं हैं।
दूर तक फैली वीरानी और खेतों की हरियाली के पार
मुख्य सड़क पर कुछ और धुंधलाते होर्डिंग्स और झंडियां दिखाई दे रहे थे। शहर से दूर
एक नया शहर बसाने की कवायद सरीखे। सारी हरियाली रेत, बजरी
और सीमेंट में कहीं खो गई थी। प्रखर सोचने लगा कि इतनी बड़ी हरियाली को मिटाकर
अल्ट्राग्रीन जैसे प्रोजैक्ट्स में कैसे हरे सपने दिखाए जा रहे थे। सड़क के उस तरफ
भी खेतों के हथियाए जाने का सिलसिला साफ तौर पर दिख रहा था। और शहर से दूर निकल
आने पर इन्हीं खेतों के बीच जगह-जगह बड़े ट्रक,खुदाई
की मशीनें, मिट्टी के झाबे ढोते मजदूर भी। साथ ही जमीन खोदकर
बनाई जा रही नींव में प्रखर को उन हजारों
घरों के झिलमिलाते सपने दीख रहे थे जो खेत मालिकों को कुछ और बड़े सपने बेचकर
खरीदे गए थे या फिर उनके सपने तोड़कर अपने विराट सपनों के लिए हथिया लिए गए थे।
सपनों के खरीदे-बेचे जाने का जैसे ये कोई महान दौर था जहां अपने सपने को किसी और
के सपने की नींव पर खड़ा करने का चलन धड़ल्ले से जारी था।
प्रखर तो कुछ भी सोच नहीं पा रहा था पर संभव ने हार नहीं मानी।
‘‘यार जब ये खेत बिक
ही रहे हैं तो हम पंद्रह-बीस अपने जैसे लोग मिलकर क्यों न एक ज़मीन खरीद लें। इतनी
दूर नहीं थोड़ी आगे की। ठीक है कीमत ज़्यादा होगी न पर दूरी तो कम ही होगी यहां
सेऔर आगे जमीन होने के चलते बाकी सुविधाओं
भी मिल जाएंगीं।’’
संभव की बात ने प्रखर
को सोचने पर मजबूर कर दिया। दिमाग बड़े विचारों को झटककर केवल अपने बारे में नई
योजनाओं का खाका बनाने लगा। आते समय रास्ता की शुरूआत में हाईवे से सटे कई
प्रोजैक्ट के बीच थेगलियों की तरह कुछ खेतों पर उसने भी गौर किया था। पर संभव की
बात के बाद वह नये सिरे से सोचने लगा-‘‘जहां बिल्डरों ने इतनी बड़ी जमीनें हथियाईं
हैं, हम तो एक छोटा-सा टुकड़ा ही लेंगे। हमारी ज़रूरत
के साथ किसी और की ज़रूरत भी पूरी हो जाए इतना भर।’’ये सोचते ही वह बोला-
‘‘ संभव
वहां आगे की तरफ मंहगी होगी ज़मीन। पर हम भी फ्लोर टाइप बना लेंगे। एक-डेढ़ साल
में बनकर खड़े हो जाएंगे मकान । फिर बनवाने में सबका बराबर पैसा और साझी मदद। ये
बढि़या आइडिया है।’’
प्रखर की बात से
अपने कहे को तारीफ मिलते ही संभव ने कहा -‘‘क्यों न आज ही वहां बैठे किसी डीलर से
बात कर लें?’’ प्रखर की आंखों में उतरी चमक और होंठों की मुस्कान
से ग्रीन सिग्नल मिलते ही संभव ने गाड़ी की स्पीड बढ़ा दी। हाईवे पर गाड़ी आगे बढ़
ही रही थी कि रफ्तार धीमी पड़ने लगी । आगे रास्ता जाम, कोई
गाड़ी टस से मस नहीं हो रही थी। कुछ देर इंतज़ार के बाद दोनों गाड़ी से बाहर
निकले। काफी आगे तक नज़ारा यही था।
‘‘आगे जाने किसलिए
भीड़ ने रास्ता रोका हुआ है। पता नहीं कब खुलेगा जाम?’’
जाम में फंसा एक
परेशान स्वर गूंजा। आगे बढ़ने का कोई रास्ता न पाकर संभव ने गाड़ी को ज़रा पीछे
लेकर साइड में लगा दिया और जिज्ञासा में दोनों भीड़ की दिशा में बढ़ चले। काफी आगे
जाकर जो नज़ारा उन्होंने देखा तो आंखों पर विश्वास नहीं आया। इस वीराने में इतनी
भीड़? इतने लोग? और उनके आगे ये
क्या?... दोनों हिल गए। सड़क पर दो-ढाई सौ लोग धरना देकर
बैठे थे। इनमें औरतें और बच्चे भी शामिल थे। उनके आगे रखी बांस की टिकटी पर एक
मुर्दा जिस्म सफेद चादर में से चेहरे के रूप में झांक रहा था। सड़क पर अचानक से
धरने में बैठे उन लोगों को देखकर लगा कि ये लोग जल्दी नहीं उठने वाले। जाम में फंस
गए लोग उनके इस कदर बैठने के प्रति गुस्से से भरे
थे पर एक मुर्दा जिस्म उनके गुस्से का काबू कर रहा था। भीड़ में औरतों के रोने का स्वर था, आदमियों की शिकायत भरी नाराज़गी थी और स्कूल यूनिफॉर्म में बैठे कुछ मासूम बच्चों की परेशानियां थीं
जिन्हें अचानक घटी दुर्घटना ने स्कूल की बजाय सड़क के बीच बिठा दिया था। पूरा गांव
अचानक यहां आ जुटा था। बिखरी हुई अनेक आवाजों में एक जबरदस्त शोर था।
प्रखर को अब तक जो
खबरें किसी और दुनिया की लगतीं थीं आज सामने सीधी घटित होती दिखने लगीं । ज़रा सी
छानबीन और जिज्ञासा ने शव के सच को नुमायां कर दिया।
‘‘ साहब
बड़ा जिद्दी था जीतू। आस-पास सब जमीनें बेच रहे थे पर इसने न बेची। मौके की जमीन
थी। बिल्डरों-डीलरों ने कितना डराया-धमकाया पर डटा रहा। कहता ‘बाप-दादाओं की जमीन
बेचकर कहां जाऊंगा? क्या करूंगा?’ पर
मौसम मार गया उसे। पिछले महीने की बारिश में इसकी खड़ी फसल बर्बाद हो गई...हम जैसे
कईयों की हुई है। सभी कष्ट भोग रहे हैं । जीतू पर तो कर्जा चढ़ा था फसल के चक्कर
में और फसल खराब...करे तो क्या करे? मुआवजे के लिए
सरकारी दफ्तरों के कितने चक्कर काटे पर किसी ने नहीं सुनी। ऊपर से बैंक वाले आए
दिन परेशान करने लगे। और जगहों पर भी कितने जन मर रहे हैं जीतू की तरह। न सरकार
सुनती है, न बैंक, सब अपनी देखते हैं।
लोेगों को हम दिखते ही कहां हैं? हर घर की कहानी है
पर सुनने वाले नहीं हैं, इसीलिए आज जीतू को
लेकर बैठे हैं हम सारे।’’
प्रखर को लगा जैसे एक ज़ोरदार तमाचा उसीके गाल
पर पड़ा। अपने सपनों की दुनिया में खोया रहकर उसने कहां गौर किया था देश के अनेक
राज्यों में किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याओं पर? उसने
कहां महसूस किया था बाहरी कंपनियों द्वारा मंहगे और खराब बीज बेचने और उनसे हुई
बर्बाद जमीन का दर्द? कब जानना चाहा था उसने कर्ज की अंतहीन गाथाओं और
उनके बदले सलफास गटकते परिवारों के सच को? क्या फ्रिक थी उसे
जबरन हथियाई जा रही किसानी जमीनों की या
मौसम की मार और चैपट फसल में तबाह जिंदगियों के आंसुओं की? आज इस एक शव ने उसे थर्रा दिया। इस सैलाब में मुर्दा तो सिर्फ एक था पर
बाकी सब भी हरकत के बावजूद उसे मुर्दा ही नज़र आने लगे। ये शोर चीखते हुए एक संवाद
बुन रहा था जिसमें परेशान जि़ंदगियों के सच थे, कराहती
पीड़ाएं थीं, और सरेराह अनगिनत मौतों के इल्ज़ाम थे, इल्ज़ाम उन पर जो आजीवन हर इल्ज़ाम से बरी थे।
तमाशबीन भीड़ में से अधिकांश को
इन किसानों की तकलीफ कुछ सच लगी तो कुछ नाटक।
प्रखर ने महसूस किया जो मौसम यहां आते हुए उनके लिए रोमांस की कल्पनाओं को
गुलज़ार कर रहा था वही मौसम जाते हुए इस कदर जानलेवा हो गया है। शहर से चंद
किलोमीटर के दायरे में सच की शक्ल कैसी भयानक हो गई। उसे लगा क्या गलत कहा उस आदमी
ने- एक ही जगह रहने वाले लोग किस तरह एक- दूसरे की जि़ंदगियों से अनजाने और बेगाने
हैं। जो मरा उसके साथ बहुत कुछ खत्म हो गया पर जो जिंदा बाकी हैं उनका क्या?
सब सोचकर प्रखर को इस रास्ते आते हुए गाए जाने वाले सभी मधुर गीत खंूखार
लगने लगे। दूसरी तरफ संभव को ये चिंता खाए जा रही थी कि कहीं देरी की वजह से समय न खत्म हो जाए और डीलर से
मिलना न हो पाए।
कुछ समय बाद धरना, पटरियों
और सड़क के कुछ हिस्से में सिमटा दिया गया। एक-एक करके धीमी रफ्तार से ही सही
गाडि़यां खिसकने लगीं। प्रखर के कदम घर की दिशा में लौट रहे थे। उसने गौर किया,
सड़क के दोनों तरफ बची-खुची हरियाली का रंग अब हरा नहीं रह गया बल्कि
सूखे खून- सा धूसर हो चला है। प्रखर जिस लो बजट के चक्कर में घर ढूँढने निकला था आज उसे अपने आसपास सब लो ही दिख रहा
था- विकास ,नीतियां, व्यवस्था और सबसे
अधिक इंसानियत।