बुधवार, 15 जुलाई 2015

'घर उसका सपना था और बजट उसकी हकीकत ...' मित्रों वर्तमान साहित्य के जुलाई अंक में प्रकाशित मेरी कहानी 'लो बजट' आप सभी के लिए..आपकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेगा.

कहानी

                                                               
                                                                 लो बजट
                                           
प्रज्ञा
                                                                                                                               

‘‘संभव यार! कहां भेज दिया तूने हम लागों को? दिन भर खाक छानी और रिज़ल्ट ज़ीरो।’’
एक पूरे दिन की बर्बादी प्रखर को बेचैन किए जा रही थी। बल्कि उसकी बढ़ती खीज और झुंझलाहट का असली कारण था कि पिछले कुछ महीनों से ज़ाया होते चले आ रहे दिनों में एक और दिन का बढना़। संभव से बात करते हुए चाहकर भी प्रखर उस झुंझलाहट को दबा न सका। उसके चेहरे से सारे मनोभावों को पहचानकर संभव ने सहानुभूति का फाया तैयार किया-
‘‘ भाई फ्रिकमंद न हो। ये काम कोई एक-दो दिन के नहीं हैं। टाइम लग ही जाता है। इस बहाने तू एक अच्छी रिसर्च कर रहा है अपने एरिया की, ये तो सोच?’’
‘‘खाक रिसर्च! थकान से भर रहा हूं। तूने कितने प्रोपर्टी डीलर्स को मेरे नम्बर दे दिए हैं? ये बद्तमीज़! न दिन देखते हैं न रात, न ही कोई छुट्टी । बस आर्डर  दे देते हैं।
‘‘सर आ जाओ फ्लैट दिखा दूं। आपके बजट में है। हो सके तो मैडम को भी ले आना। हमारा दूसरा चक्कर बचेगा और आपको भी फाइनल करने में कोई मुसीबत नहीं आएगी।’’
‘‘ अब तू खुद बता वो तेरी सहूलियत देखें या तेरी सुविधा?’’ संभव ने प्रखर को शांत करते हुए कहा।
कुछ देर कमरे में शांति रही फिर प्रखर का स्वर गूंजा।
‘‘ पता है तुझे ‘आपके बजट में ’-ये तीन शब्द मुझे अजगर जैसे लगने लगे हैं। एक तरफ तो इनसे शीशे में उतारे जाने का खूब काम लिया जाता है। हमें लगता है अगला हमारी आर्थिक हालत को समझ रहा है। हमारा बजट कम है तो उसे हमसे ज़रा हमदर्दी होगी। कर रहा होगा हमारे लिए हमसे बढ़कर कोशिश। पर जब बात आमने-सामने होती है तो हमदर्दी भाड़ झौंकने चली जाती है। कहते हैं-
‘‘देख लो सर जी। अब इतने में तो ऐसा ही मिलेगा। और गुड़ डालो ज़रा, तब स्वाद आएगा।’’
प्रखर अपनी रौ में बोलता चला जा रहा था-‘‘हर बार हर आदमी जैसे मुझे मेरी औकात बताने लगता है। और ऐसे जताता है जैसे मैं लो बजट कहकर कोई गटर मांग रहा हूं अपने रहने के लिए। ’’
तमाम अफसोस , गुस्सा और बेचैनी प्रखर को लगातार कुंठित किए दे रही थी। काम न बन पाने की परेशानी से ज़्यादा इन दिनों गैरों से मिला अपमान उसे अपनी ही नज़रों में गिरा रहा था। ऐसे में संभव का समझाना उसे फिजूल लगा।
संभव से मिली सहानुभूति और  हौसले में कुछ दिन बीते ही थे कि आज फिर नयी मुसीबत खड़ी हो गई। छुट्टी का दिन था। मंजरी कितनी खुश थी और नील गोद से उतरने का नाम नहीं ले रहा था। प्यारी छुटकी महीना भर होने के बावजूद कोई अच्छा- सा नाम न मिलने से बेखबर बिस्तर पर खिड़की से छनकर आ रही धूप में मग्न थी। यही है न एक सुखी जीवन की परिभाषा। यही है वो सपना जिसे हर आदमी साकार करना की चाह रखता है और एक छत्त के नीचे ये फलता-फूलता सपना इतवार में नहाकर जरा परवान चढ़ा ही था कि नामुराद फोन बज उठा।
‘‘सर जी नया फ्लैट मिला है। देख लो आपके बजट में है।’’ सतिंदर नाम के उस आदमी के फोन ने सारा इत्मीनान एकबारगी छीन लिया। वो तो मंजरी का हौसला था तो सारा काम निबटाकर इस उम्मीद से मन बना लिया कि आज काम हो ही जाएगा। प्रखर ने उसके उत्साह पर भरोसा करके अपनी छुट्टी दांव पर लगा दी।
जो फ्लैट उनके बजट में था वो एक छोटी -सी सोसायटी थी। उस छोटी- सी सोसायटी में बी टाइप का, उनके बजट का फ्लैट देखकर किसी को भी उल्टी आ जाती।
‘‘कितना सड़ाकर रखते हैं घरों को लोग? हमें देखो हम किराए के मकान को भी कितना सुंदर  बनाकर रहते हैं।’’ मंजरी अपने भावों का रास्ता रोक न सकी।
दोनों ने महसूस किया घर वाकई नाकाबिल- ए- बर्दाश्त था। ज़मीन पर मैल की काली, चीकट परतें देखकर जैसे ही दोनों ने सतिंदर का चेहरा देखा तो उसकी आंखें समूचा सवाल ताड़ गईं।
‘‘ ये तो घर बंद है न ...फिर सफेदी करवाओगे आप तो घिसाई वाले को बुलवा लेना। चकाचक हो जाएगा। बढि़या चिप्स का फर्श है और मन न चाहे तो नए डिज़ायन की टाइलें लगवा लेना और क्या?’’
दोनों मुंह देखने लगे एक-दूसरे का और सतिंदर के सुरसामयी बोलों पर हैरत करने लगे। अभी घर लेने में ही कितना कर्जा लेना पड़ेगा और इसने नई टाइलों वाले फर्श की बात कैसी आसानी से कह दी।
रसोई में कदम रखते ही मंजरी का माथा ठनका। ये स्लैब है? इसकी ऊंचाई कितनी कम है। मेरी गर्दन ही टूट जाएगी इतना झुककर। काम ही नहीं होगा। एक बार फिर उस लो बजट फ्लैट ने भविष्य में आने वाली असुविधाओं का बिगड़ा चेहरा दिखा दिया।
इस बार सतिंदर बिना सवाल के उनकी बातचीत के बीच में टपक पड़ा। ‘‘जी मालिक ने रहने के लिए नही, बेचने के वास्ते ही खरीदा था इसे। ये स्लैब तो नया पड़वाया है इसमें। अब ठेके पर दे देते हैं लोग। इनके पास इतना टाइम कहां जो इन छोटी प्रॉपरटियों  में मगज मारें। मिस्त्रियों ने बना दिया अपनी मर्जी का।’’
प्रखर-मंजरी अभी कुछ सोच ही रहे थे कि सतिंदर फिर बोल पड़ा-‘‘सर जी आप ले लो इसे। जाने मत दो। स्लैब का क्या है नया लगवा लेना आप। फिर ये तो देखो लकड़ी का काम किया- कराया है इसमें।’’
दोनों ने देखा जिस लकड़ी के काम के इतने तूमार बांधे जा रहे थे वो अपना मुंह  दिखाने लायक भी नहीं था। एक अलमारी और कुछ शेल्फ...बस। और रसोई में जो काम हुआ था उसका सनमाईका जगह-जगह से फूला  हुआ था। पल्लों को खोला तो कलई ही खुल गई। बोर्ड पर दो सूत की प्लाई एक-दूसरे से नाराज़  विपरीत दिशाओं में भाग रही थी और उसके बीच दीमकों के धमाचौकड़ी करने का अड्डा बना था। मंजरी ने जिस चाव से पल्ला खोला उससे दोगुने डर से भड़ाक से  बंद कर दिया। सिहरन से झनझनाते शरीर को उसने यों झटका जैसे दीमकें पल्लों से निकलकर उसके शरीर पर तैर रही हों। खींसे निपोरते सतिंदर की आंखों ने मासूमियत से पुराने तर्क दोहरा दिए-‘‘घर सालों से बंद है और फिर काम तो नया करवाओगे ही आप।’’ आज के दिन की निराशा को प्रखर-मंजरी साफ देख पा रहे थे। इधर नील तो बाहर खेल में मस्त था पर धैर्य की पूरी परीक्षा दे चुकी छुटकी जोर-जोर से रोने लगी।
 लौटते समय दोनों खामोश थे पर दोनों की खामोशी बहुत कुछ कह रही थी। मंजरी सोच रही थी कि उनकी किस्मत ही खराब है। अब कोई मकान नहीं मिलेगा उन्हें और प्रखर गुस्से में था। ‘‘ अब कोई बात नहीं करनी किसी सतिंदर-फतिंदर से। जो बात होगी सीधी डीलर तेजपाल से ही होगी।’’-उसने सोचा। शाम को प्रखर, संभव के साथ डीलर तेजपाल के ऑफिस  जा पहुंचा।
‘‘आओ मालकों। क्या हाल-चाल? लगता है आज तो चीज़ पसंद आ गई आपको। तो करवाऊं बयाना?’’ तेजपाल अपने नाम के पूवार्द्ध के समान ही बातों और फितरत दोनों में तेज था।
‘‘बयाना? आपने मजाक बनाया हुआ है? क्यों टाइम खराब कर रहे हो हमारा?’’प्रखर के जेनुइन गुस्से को संभव देखता रह गया। अपनी आदत के मुताबिक वो चाहता था बातचीत का लहजा प्रखर के अनुभव की तरह तल्ख और शिकायती न हो। पर अब तीर तरकश से निकल चुका था और लगा भी ठीक निशाने पर था। तेजपाल की भंगिमा के साथ उसका स्वर भी बदल गया।
‘‘कैसे टाइम खराब हो रहा आपका?’’
‘‘ आपका आदमी एरिया के सबसे बेकार फ्लैट दिखा रहा है हमें। सैकडों नुक्स हैं उनमें। उन्हें सुधरवाने के खर्च में तो एक नया फ्लैट ही आ जाएगा।’’ बात को अपने गुस्से के आकार में ही प्रखर ने रख दिया।
‘‘ तो बजट बढ़ा लो अपना और ले लो मनमाफिक चीज़।’’ सपाट आक्रामकता में तेजपाल के शब्द गूंजे।
‘‘ बढ़ा लें बजट? ये क्या बात हुई? हमने तो आपको पहले ही बता दिया था कि हमारा बजट कम है और हमें उसीमें क्या-क्या सुविधाएं चाहिए।’’ प्रखर के खदबदाते शब्दों को अपनी मुलायमियत के रंग में ढालकर और शिकायत को डायल्यूट करते हुए संभव को बीच में उतरना ही पड़ा -
‘‘ परेशान हो गया है ये बस। आप तो जी हल निकालो। इसके बजट में कोई ऐसी चीज़ दिलाओ कि ज्यादा झंझट न हों। बस कोई रेडी टू शिफ्ट टाइप। सफेदी कराकर काम निकल जाए कुछ साल।’’
‘‘ रेडी टू शिफ्ट जैसी चीज़ और इतने लो बजट में? मार्किट का अंदाजा है आपको? अच्छी चीज़ आती बाद में है बिक पहले ही जाती है।’’
तेजपाल के इस झूठ को भी प्रखर अपने अनुभव से साफ समझ गया था ,उससे कहे बिना न रहा गया-
‘‘ ये सब आप लोगों का फैलाया गया है । तीन महीने पहले जो फ्लैट  दिखाया था न सतिंदर ने अब तक नहीं बिका है। पता तो होगा ही आपको।’’ तेजपाल की परवाह न करते हुए प्रखर बोलता गया। उसे अब तेजपाल के खेल समझ आने लगे थे। पहले कोई मंहगी, चमचमाती चीज़ दिखा दो ग्राहक को जो उसके बूते के बाहर हो और जब सारी निराशाएं उसे कुंठित कर दें, हीन भावना से भर दें तो अपना दांव खेलकर वही घटिया चीज़ बिकवा दो जो बिकवाना चाहते हो।
 तेजपाल को भी अब खरीददार के रूप में प्रखर का कोई पास न रह गया था फिर अब उसके पास प्रखर के लायक कोई विकल्प बचा भी नहीं था। संभव की पैचअप की पहल के कारण अब तक दिखाई जा रही सहानुभूति का आखिरी चोला भी फेंककर वह पूरी तरह बेदर्दी पर उतर आया-
‘‘ आप क्या समझ रहे हो मकान खरीदने को? इतना आसान है क्या? फ्लैट पसंद आ भी गया तो उसके साथ रजिस्ट्री की कीमत जोड़ो। हमारे दो परसेंट कमीशन को जोड़ो। फिर कागज बनवाई के साथ अथोरिटी से कागज निकलवाने का खर्चा जोड़ो। और फ्लैट की ये कीमत तो हम बता रहे हैं असली कीमत तो तय होगी मालिक के साथ टेबल पर। वो कीमत बढ़ा भी सकता है घटा भी सकता है। फिर आप उसकी चीज़ में नुक्स निकालने वाले कौन? उसने आपकी सुविधा के लिए नहीं अपने इन्वैस्टमेंट के लिए प्राॅपर्टी खरीदी है। बाज़ार से शर्ट अपने नाप की लाते हो न किसी और के नाप की तो नहीं, उसी तरह मकान है बनवाना पड़ता है उसे अपने मुताबिक। तो देख लो जो आपका बजट है न मामला उससे तीन-चार लाख ऊपर ही जानो। समझ में आए तो ठीक वर्ना...।’’
प्रखर को तेजपाल ने पूरी तरह नंगा कर दिया था और प्रखर ने समझ लिया इस लो बजट में उसे अपनी कोई इच्छा रखने का भी हक नहीं। तीन महीने की पूरी मेहनत बेकार हो गई थी। कुछ देर की चुप्पी के बाद  तेजपाल की तनी हुई मुद्रा बड़ी और मोटी-मोटी आंखों में तैरते लाल रेशे, निचले जबड़े पर ऊपरी दांतों का भरपूर दबाव और उससे गालों पर उभर आई भयानक सख्ती को उसने महसूस किया। उसका कद्दावर शरीर और मेज पर फैली मजबूत बांहें भी यकायक उसे भयभीत करने लगीं। जोश में बोली गईं उसकी बातें अब बता रही थीं कि उससे कहां और कितनी चूक  हो गई । उसे ध्यान आया कि हर बार बातचीत के दौरान तेजपाल के दोनों हाथों की उंगलियां मेज पर फैली रहतीं और उनके फैलाव के नीचे शीशे से झांकता उस एरिया का समूचा नक्शा उसकी ताकत तले दबा रहता है । सच को मजबूती से कहने के बाद अब तेजपाल के ऑफिस  से निकलने पर खुद का कहा सच ही रीढ़ की हड्डी में झुरझुरी फैलाने लगा। महसूस हुआ कि तेजपाल के हाथ जैसे मेज पर बैठे-बैठे उसके पहुँचने से पहले ही उसके घर में घुसकर मंजरी,नील और छुटकी का गला दबा देंगे। कांपते कदमों और धड़कते दिल से प्रखर ने घर की ओर कदम बढ़ाए। संभव का साथ आज निश्चित ही किसी ढाल से कम नहीं लग रहा था। दोनों निराश कदमों से लौट आए। प्रखर के लिए उस निराश-हताश, डरावने दिन की रात तो खत्म हुई पर बात खत्म न हो सकी।
                अगले दिन उसके ऑफिस  जाने से पहले मंजरी ने फ्रिकमंद होते हुए कहा-
‘‘ अपने बाऊजी से बात करूं क्या?’’
मंजरी को एकटक घूरकर उसने सख्त आवाज़ में कहा-‘‘ नहीं...एकदम नहीं।’’
 मंजरी चुप हो गई । प्रखर ऑफिस  के लिए चल पड़ा। रोज़ की तरह हाईवे पर ‘होम स्वीट होम’ और नए हाउसिंग प्रोजैक्ट के बड़े-बड़े होर्डिंग्स उसकी खिल्ली उड़ा रहे थे। ऑफिस  तो वो चला आया पर वहां मन नहीं लगा। सिगरेट पीने के बहाने बाहर आया तो आरिफ दिखाई दिया। उदासी आरिफ का चेहरा ही बन गई है जैसे। अब आरिफ में वैसी जिंदादिली  नहीं थी जैसे कुछ साल पहले थी। प्रखर की आंखों के आगे वही पुराना आरिफ घूम गया।
‘‘ बस भाईजान अब्बा से पैसे लेकर और अपनी बचत से एक हाउसिंग प्रोजैक्ट में अपना मकान बुक कर लिया है मैंने। सैकड़ों मकान है उसमें।’’ उन दिनों आरिफ परिंदों की तरह उड़ता-फुदकता। कुछ दिन बाद प्रोजैक्ट शुरू भी हो गया। फिर किश्तें जाने लगीं। आरिफ की उड़ान कुछ और मुक्त हो गई । कुछ दिन बाद ड्रा निकलने की मिठाई भी खिलाई उसने। अब कच्चा सा ही सही उसके सपनों को एक खूंटा  मिल गया था। उड़ान भी और ऊंची हो चली  कि एक दिन साथ काम करने वाले सतीश ने बताया-
‘‘ सब खत्म हो गया। आरिफ बर्बाद हो गया।’’ बात दरअसल ये थी कि हाउसिंग सोसायटी को बनवाने वाले बिल्डर ने नवें या दसवें माले पर पैंट हाउस के नाम पर जितने लोगों का फ्लैट  बुक किया था उस पैंट हाउस की परमीशन उसने ली ही नहीं थी। अवैध निर्माण को बड़ी चालाकी से उसने छिपा लिया था। अचानक एक दिन लोगों के सामने सच्चाई  आई कि पैंट हाउस एप्रूव्ड प्लान का हिस्सा है ही नहीं। हंगामा मच गया।
‘‘ कुछ नहीं भाई!  बिल्डर कहता है एप्रूवल ले लेगा और नहीं भी हुआ तो हमारा जो भी रूपया मिलेगा कोई मकान तो मिल ही जाएगा उसमें।’’ आरिफ टूटा ज़रूर था पर उम्मीद अभी बाकी थी। पर कुछ दिन बाद बिल्डर भाग गया। तबसे आज तक फ्लैट खड़े-खड़े जर्जर हो रहे हैं और कोर्ट की तय मियाद के बाद ढहा भी दिए जाएंगें। उनके साथ ढह जांएगें सैकड़ों सपने। आज आरिफ को देखकर थोड़ा- सा संतोष ज़रूर हुआ था प्रखर को-‘‘ कि चलो जैसा भी हूं आज इसकी तरह ठगा तो नहीं गया हूं। जरा उदासी की धुंध है, कुछ समय की। मौसम बदलेगा  तो धुंध भी झंट जाएगी।’’
 कुछ समय के लिए मकान की चिंताओं से प्रखर ने किनारा कर लिया। उसने सोच लिया छोड़ दिया जाए अब सब भाग्य पर। होना होगा तो हो जाएगा और नहीं हुआ तो भी सड़क पर तो बैठे नहीं हैं। वैसे भी किराए के मकान क्या बुरे हैं उसने सोचा। यहां कोई मुसीबत तो नहीं। महीने में एक ही बार पैसा देना अखरता है पर फिर पूरे महीने का सुकून। ये सुकून धीरे –धीरे उसकी आत्मा पर ऐसा काबिज हुआ कि उसे लगने लगा, जब तक मन चाहेगा पड़ा रहूंगा इस मकान में और फिर निकाले जाने पर भी नहीं निकलूंगा। हाथ-पैर जोडता रहेगा मालिक। आगे हारकर केस-फेस करेगा तो देखी जाएगी। उसने हिसाब लगाया ऐसे तो कई साल बेपरवाह होकर कट जाएंगे फिर क्यों चिंताएं मोल लूं? इस कांइयां विचार ने प्रखर को बड़ी राहत पहुंचाई लेकिन जबसे वो मकान के झंझट में पड़ा था अपने आस-पास मकान से जुड़े किस्से ही दिखाई-सुनाई पड़ रहे थे। परसों ही तो, मदर डेयरी की लाइन में खड़ा था। दूध वाले भइया कह रहे थे-
‘‘ अरे खन्ना साहब आजकल किसी की सूरत पर न जाना। धोखेबाज हैं ये सारे। मकान का सपना दिखाकर ठगी खूब जोरों पर है। नए तरीके से फुसलाएंगे आपको। कहेंगे, मार्किट से कम दाम का फ्लैट  है पर अभी है फांइनैंसर के पास। बेफ्रिक होकर खरीदो हम बैठे हैं न। शीशे में उतारकर, रकम खींचकर धोखा देने में उस्ताद हो गए हैं, चोर कहीं के। आ गए इनके झांसे में फिर तो लुटे। कह देंगे कंधे उचकाकर पता नहीं फांइनेंसर कहां गायब है? अब न आप फांइनेंसर को जानो, न पास में पक्के पेपर। भटकते फिरो दरबदर।’’
‘‘ भइया इतना ही नहीं ये फर्नीश्ड फ्लोर का भी बड़ा गोरखधंधा चल पड़ा है। कम कीमत का फ्लोर पूरी टीम-टाम से बिकवाया जाता है। उसमें न धूप, न हवा। साथ वाले मकान से सटा। कोई खिड़की नहीं।  घटिया माल लगाकर फर्नीचर, एल.ई.डी. फ्रिज, वाशिंग मशीन के सामानों से आंखों पर पर्दा डाल देते हैं। हरामखोर,साले बताते हैं -‘देखिए कितना बड़ा एरिया है बारह सौ स्केवेयर फीट का।’ बाल्कनी और झज्जे घेरघार के कर देते हैं आठ सौ का बारह सौ। बाद में पकड़े जाने पर कमरा टूटे या झज्जा टूटे इनकी बला से।’’ खन्ना साहब की इन्र्फोमेंशन ने प्रखर के होश उड़ा दिए। उसे लगने लगा कि आज मकान का सपना कितना बड़ा हो गया है आदमी के लिए और बाज़ार इसी कमजोरी का अपनी पूरी निर्ममता से फायदा उठा रहा है। उसने शहर का पूरा नक्शा ही बदल दिया है। बाज़ार का अनियंत्रित विस्तार कितने घरों को लील चुका हैं। घरों में दुकानें, शोरूम्स धड़ल्ले से चल रहे है। नक्शे के साथ मोहल्ले का शांत मिजाज़ भी कबका खत्म हो चला है। बाज़ार है कि बंद होना नहीं चाहता घर है कि बाज़ार की हदों में सिकुड़-सिमटकर अपना घरपन खो बैठा है। एक बड़ी गिरोहबंदी में सभी तरह के खेल चल रहे हैं। पर आखिर कब तक? खबर का बाज़ार भी तो गरम ही है कि इन छोटे धंधे वालों की भी ज़्यादा दिन तक खैर नहीं। घर को ही रोज़गार बना चुके इन लोगों से जैसे ही रोज़गार छिनेगा, घर भी तो छिन जाएगा। फिर दुनिया के बड़े बाजार के दंभ के आगे इस छोटे बाज़ार की औकात ही क्या है? इस विचार के कौंधते ही प्रखर को ये दुकानदार अपने जैसे लो बजट वाले ही लगने लगे, अपनी तमाम आपत्तियों के बावजूद। उफ... कभी-कभी प्रखर सोचता कि मंजरी के बाऊजी के से बात कर ही लूं क्या? फिर उसका स्वाभिमान सर उठाता और खुद को पूरी हिकारत से झटककर वह खुद को सावधान करता।
                ऐसे ही उधेड़बुन में कई दिन गुजर गए। प्रखर को लग रहा था कि क्या बुरा है किराए के मकान में जिंदगी गुजारना? कम से कम वो सुखी तो है। पर उसके अपने ही आदर्शों  की रोज़ हत्या होती और हत्यारा कोई और नहीं प्रखर खुद ही होता। मकान का सपना उसके पीछे पड़ा रहता और लो बजट उसे चैन न लेने देता। उसे लगने लगा था मकान के चक्करों में आधी जनता लुट रही है और बाकी आधी लूटने के नए-नए तरीके ईजाद कर रही है। कहां जाए वो? मकान उसका सपना था और बजट हकीकत। ऐसे में एक दिन ऑफिस से लौटते हुए उसकी नज़र एक नये होर्डिंग पर पड़ी। ‘अल्ट्रा ग्रीन’ नाम से एक नामी बिल्डर का प्रोजैक्ट था। मन की सूखी शाख जैसे फिर हरी हो चली। घर आकर उस प्रोजैक्ट का ब्रोशर उसने डाउनलोड किया। बिल्डर के कई पुराने प्रोजैक्ट्स की रिसर्च की और उसकी विश्वसनीयता से आश्वस्त हुआ। सबसे अच्छी बात तो ये थी कि शहर की भीड़-भाड़ से भले ही दूर था हाउसिंग प्लैन पर कम कीमत में अधिक एरिया और कंस्ट्रेक्शन भी एकदम नया था। 
 सारी छानबीन के बाद जब प्रखर मुक्त हुआ तो दुनिया ही बदली हुई लगी। मंजरी का चेहरा आज उसे अधिक कोमल और सुंदर लगने लगा। कितने दिनों बाद आज उसके चेहरे पर बालों से खेल रही हवा को निहारा था प्रखर ने। कितने दिनों बाद उसके मन ने कहा चल जरा बच्चों के साथ बच्चा बनकर खेल ले। कितने दिनों बाद इच्छा जगी कि उठाए संभव को और निकल पड़े बेमकसद, अंतहीन सड़कों की ओर। न जाने कबसे ये सब स्थगित पड़ा था प्रखर की जिंदगी  में। मंजरी को अभी सब बताना ज़रा जल्दबाजी थी फिर इस बार वह कोई पक्की खबर ही देना चाहता था वह मंजरी को। पर संभव से बात किए बिना रहा नहीं गया।
‘‘ यार कल साथ चलेंगे...एक से दो भले।’’
‘‘ प्रखर अगर सब जंच गया तो क्यों न दोनों साथ ही खरीद लें मकान। अच्छा पड़ोस और पड़ोस में अच्छा दोस्त तकदीर वालों को ही मिलता है। फिर न कहना मैंने कहा नहीं।’’
‘‘ अच्छा और संभव? वो तो मैं हूं साले जो तुझ जैसे डरपोक और पिद्दी से निभा रहा हूं।’’ हवा में घुलते प्रखर के ठहाके ने न जाने उसके कितने दिनों के तनाव को झाड़कर उसे मुक्त कर दिया।
‘‘मैंने भी पढ़ा है इसके बारे में यार। पहली बात तो फ्लैट के साथ काफी खुला एरिया मिलेगा हमको। हवा, धूप का सच्चा सुख। ऊपर से बिजली पानी की भी कोई प्राब्लम नहीं है। और कितनी और सुविधाएं हमारे बजट में। पता है फ्लैटों के साथ कम्युनिटी हॉल  भी बनेगा। बस यार बच्चों की शादियां आसानी से निबट जाएंगीं। क्यों?’’
संभव मकान की काल्पनिक तस्वीर में सच्चे रंग भरने लगा और प्रखर भी संभव की बात पर पुरानी कहावत‘ सूत न कपास कोरियों में  लट्ठम लट्ठा ’ पर मन में हंसते हुए अपनी कल्पना को अपने रंगों से हसीन बनाने लगा।
 अगला दिन योजना के अनुरूप ही शुरू हुआ। लगभग महीना भर पहले पड़ी जोरदार बारिश की तरह इधर दो दिन से बरस रहे आसमान से दोनों को मौसम सुहाना लग रहा था। दोनों दोस्त संभव की सेंकेड हैंड गाड़ी में रवाना हुए अपनी उम्मीद के घोंसले की ओर। प्रखर और संभव दोनों को लग रहा था कि अपनी पत्नियों को भी इस रोमैंटिक मौसम में साथ ले आते, लांग ड्राइव के साथ एक पिकनिक- सी हो जाती। दोनों इश्किया गाने गुनगुनाते बढ़ने लग। पर  जैसाकि होर्डिंग दिखा रहा था कि ‘अल्ट्रा ग्रीन’ शहर से थोड़ी दूरी पर  ही है लेकिन वो काफी अंदर की तरफ था। मीलों फैली वीरानी और खेतों के बीच से रास्ता गुजर रहा था। कोई पक्की सड़क भी नहीं। दूर से ही रंगबिरंगी झंडियों और होर्डिंग्स ने बता दिया कि दोनों ठीक रास्ते पर हैं। प्रखर की सहज बुद्धि ने भांप लिया कि प्रोजैक्ट की जमीन कई खेतों को हथियाकर खरीदी गई है। सिकुड़ते खेत और फैलते मकानों के सपने के बीच विकास गाथाओं के सारे सच सामने थे। शहर से लगे देहातों को समृद्धि का सपना भी कबसे बेचा ही जा रहा था।
                ‘अल्ट्रा ग्रीन’ के ऑफिस  मे सब बातों को विस्तार से जानने के बाद दोनों आश्वस्त हुए। सारी बातें आईनें की तरह साफ थीं। पूरा प्लैन, नक्शा, किश्तों का ब्लू प्रिंट सामने था। बुकिंग कराने का पैसा तो दोनों नहीं लाए थे पर मन पक्का ही हो गया था। उस ऑफिस  से बाहर निकलकर कुछ देर गाड़ी के पास ही दोनों ने अपने निर्णय पर दुबारा विचार किया। सारी स्थितियां भरोसेमंद थीं पर कहीं कुछ खटकने लगा। सबसे पहले दूरी। शहर से इतनी दूर इस विराने में कैसा होगा जीवन? काम से लौटकर क्या इस घर में इत्मीनान का सुख उठा पांएगे या सारी जिंदगी सड़कों पर दूरी नापने में ही बीत जाएगी? दूसरी चिंता भी संग चली आई- अभी तो यहां कुछ भी नहीं, मकान खड़े होते-होते पांच-छह साल का समय तो लग ही जाएगा। ऐसे में किराया और किश्त का संतुलन कैसे बैठेगा? मान लो बैठ भी गया तो यहां मकान का नक्शा तो पास है पर किसी स्कूल, कॉलेज  और अस्पताल का नक्शा भी पास है या नहीं? कोई पक्की सड़क भी नहीं। बाज़ार तो हर जगह पहुंच ही जाता है पर अन्य सुविधाओं का क्या? ‘जंगल में मंगल’ मुहावरे में  ही सुहाना लगता है असली जिंदगी में नहीं। चलो परे हटाओ ,सबसे जूझते यहां आ भी गए तो क्या गारंटी है कि पड़ोस भी मिलेगा? हो सकता है शहर के धन्ना सेठों ने इन्वैस्ट करने के इरादे से यहां भी बुकिंग करा दी तो कौन रहेगा इस सुनसान में? शहर के किनारे ऐसे कितने हाउसिंग प्रोजैक्ट्स वीरान पड़े हैं उसी तरह कहीं ये भी...। कितना अच्छा रहता यदि इंसान के मन के कोने में संशय घर न बनाता तो आज सब पक्का हो ही जाता। दोनों के जीवन में एक शुरूआत हो जाती तो जीवन की बड़ी जिम्मेदारी पूरी होती। सारे पहलुओं पर गौर करने के बाद प्रखर और संभव के सपने बेरंग हो गए। हौसले फिर पस्तहाल हो गए और चेहरों पर नहाया- सा उत्साह न जाने ऐसी गर्त में समा गया कि उसके निशां भी ढूंढे से नहीं मिले।
                कुछ देर दोनों वहीं खड़े रहे। संभव की निराशा अपने चरम पर थी तो प्रखर एकदम खामोश। दूर तक फैले खेतों को आंखों के थकने की हद तक निहारा उन्होंने । प्रखर के दिमाग में अनेक तंरगें उठ-गिर रहीं थीं। मंजरी के पिता से आर्थिक मदद लेकर मकान की समस्या हल करना कोई मुश्किल बात नहीं थी। आजकल बच्चे साधिकार हिस्सा मांगते हैं ,फिर भाई की जगह बहन मांग ले तो क्या बुरा है? पर सारी दिक्कत उसके अपने उसूलों की ही थी। मन में ये भी आ रहा था कि संभव जैसे भी तो अनेक हैं जिनके पास सहूलियत के कोई विकल्प नहीं हैं।
 दूर तक फैली वीरानी और खेतों की हरियाली के पार मुख्य सड़क पर कुछ और धुंधलाते होर्डिंग्स और झंडियां दिखाई दे रहे थे। शहर से दूर एक नया शहर बसाने की कवायद सरीखे। सारी हरियाली रेत, बजरी और सीमेंट में कहीं खो गई थी। प्रखर सोचने लगा कि इतनी बड़ी हरियाली को मिटाकर अल्ट्राग्रीन जैसे प्रोजैक्ट्स में कैसे हरे सपने दिखाए जा रहे थे। सड़क के उस तरफ भी खेतों के हथियाए जाने का सिलसिला साफ तौर पर दिख रहा था। और शहर से दूर निकल आने पर इन्हीं खेतों के बीच जगह-जगह बड़े ट्रक,खुदाई की मशीनें, मिट्टी के झाबे ढोते मजदूर भी। साथ ही जमीन खोदकर बनाई जा रही नींव में  प्रखर को उन हजारों घरों के झिलमिलाते सपने दीख रहे थे जो खेत मालिकों को कुछ और बड़े सपने बेचकर खरीदे गए थे या फिर उनके सपने तोड़कर अपने विराट सपनों के लिए हथिया लिए गए थे। सपनों के खरीदे-बेचे जाने का जैसे ये कोई महान दौर था जहां अपने सपने को किसी और के सपने की नींव पर खड़ा करने का चलन धड़ल्ले से जारी था।
                प्रखर तो कुछ भी सोच नहीं पा रहा था पर संभव ने हार नहीं मानी।
‘‘यार जब ये खेत बिक ही रहे हैं तो हम पंद्रह-बीस अपने जैसे लोग मिलकर क्यों न एक ज़मीन खरीद लें। इतनी दूर नहीं थोड़ी आगे की। ठीक है कीमत ज़्यादा होगी न पर दूरी तो कम ही होगी यहां सेऔर आगे  जमीन होने के चलते बाकी सुविधाओं भी मिल जाएंगीं।’’
संभव की बात ने प्रखर को सोचने पर मजबूर कर दिया। दिमाग बड़े विचारों को झटककर केवल अपने बारे में नई योजनाओं का खाका बनाने लगा। आते समय रास्ता की शुरूआत में हाईवे से सटे कई प्रोजैक्ट के बीच थेगलियों की तरह कुछ खेतों पर उसने भी गौर किया था। पर संभव की बात के बाद वह नये सिरे से सोचने लगा-‘‘जहां बिल्डरों ने इतनी बड़ी जमीनें हथियाईं हैं, हम तो एक छोटा-सा टुकड़ा ही लेंगे। हमारी ज़रूरत के साथ किसी और की ज़रूरत भी पूरी हो जाए इतना भर।’’ये सोचते ही वह बोला- 
‘‘ संभव वहां आगे की तरफ मंहगी होगी ज़मीन। पर हम भी फ्लोर टाइप बना लेंगे। एक-डेढ़ साल में बनकर खड़े हो जाएंगे मकान । फिर बनवाने में सबका बराबर पैसा और साझी मदद। ये बढि़या आइडिया है।’’
प्रखर की बात से अपने कहे को तारीफ मिलते ही संभव ने कहा -‘‘क्यों न आज ही वहां बैठे किसी डीलर से बात कर लें?’’ प्रखर की आंखों में उतरी चमक और होंठों की मुस्कान से ग्रीन सिग्नल मिलते ही संभव ने गाड़ी की स्पीड बढ़ा दी। हाईवे पर गाड़ी आगे बढ़ ही रही थी कि रफ्तार धीमी पड़ने लगी । आगे रास्ता जाम, कोई गाड़ी टस से मस नहीं हो रही थी। कुछ देर इंतज़ार के बाद दोनों गाड़ी से बाहर निकले। काफी आगे तक नज़ारा यही था।
‘‘आगे जाने किसलिए भीड़ ने रास्ता रोका हुआ है। पता नहीं कब खुलेगा जाम?’’
जाम में फंसा एक परेशान स्वर गूंजा। आगे बढ़ने का कोई रास्ता न पाकर संभव ने गाड़ी को ज़रा पीछे लेकर साइड में लगा दिया और जिज्ञासा में दोनों भीड़ की दिशा में बढ़ चले। काफी आगे जाकर जो नज़ारा उन्होंने देखा तो आंखों पर विश्वास नहीं आया। इस वीराने में इतनी भीड़? इतने लोग? और उनके आगे ये क्या?... दोनों हिल गए। सड़क पर दो-ढाई सौ लोग धरना देकर बैठे थे। इनमें औरतें और बच्चे भी शामिल थे। उनके आगे रखी बांस की टिकटी पर एक मुर्दा जिस्म सफेद चादर में से चेहरे के रूप में झांक रहा था। सड़क पर अचानक से धरने में बैठे उन लोगों को देखकर लगा कि ये लोग जल्दी नहीं उठने वाले। जाम में फंस गए लोग उनके इस कदर बैठने के प्रति गुस्से से भरे  थे पर एक मुर्दा जिस्म उनके गुस्से का काबू कर रहा था।  भीड़ में औरतों के रोने का स्वर था, आदमियों की शिकायत भरी नाराज़गी थी और स्कूल यूनिफॉर्म  में बैठे कुछ मासूम बच्चों की परेशानियां थीं जिन्हें अचानक घटी दुर्घटना ने स्कूल की बजाय सड़क के बीच बिठा दिया था। पूरा गांव अचानक यहां आ जुटा था। बिखरी हुई अनेक आवाजों में एक जबरदस्त शोर था।
प्रखर को अब तक जो खबरें किसी और दुनिया की लगतीं थीं आज सामने सीधी घटित होती दिखने लगीं । ज़रा सी छानबीन और जिज्ञासा ने शव के सच को नुमायां कर दिया।
‘‘ साहब बड़ा जिद्दी था जीतू। आस-पास सब जमीनें बेच रहे थे पर इसने न बेची। मौके की जमीन थी। बिल्डरों-डीलरों ने कितना डराया-धमकाया पर डटा रहा। कहता ‘बाप-दादाओं की जमीन बेचकर कहां जाऊंगा? क्या करूंगा?’ पर मौसम मार गया उसे। पिछले महीने की बारिश में इसकी खड़ी फसल बर्बाद हो गई...हम जैसे कईयों की हुई है। सभी कष्ट भोग रहे हैं । जीतू पर तो कर्जा चढ़ा था फसल के चक्कर में और फसल खराब...करे तो क्या करे? मुआवजे के लिए सरकारी दफ्तरों के कितने चक्कर काटे पर किसी ने नहीं सुनी। ऊपर से बैंक वाले आए दिन परेशान करने लगे। और जगहों पर भी कितने जन मर रहे हैं जीतू की तरह। न सरकार सुनती है, न बैंक, सब अपनी देखते हैं। लोेगों को हम दिखते ही कहां हैं? हर घर की कहानी है पर सुनने वाले नहीं हैं, इसीलिए आज जीतू को लेकर बैठे हैं हम सारे।’’
 प्रखर को लगा जैसे एक ज़ोरदार तमाचा उसीके गाल पर पड़ा। अपने सपनों की दुनिया में खोया रहकर उसने कहां गौर किया था देश के अनेक राज्यों में किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याओं पर? उसने कहां महसूस किया था बाहरी कंपनियों द्वारा मंहगे और खराब बीज बेचने और उनसे हुई बर्बाद जमीन का दर्द? कब जानना चाहा था उसने कर्ज की अंतहीन गाथाओं और उनके बदले सलफास गटकते परिवारों के सच को? क्या फ्रिक थी उसे जबरन हथियाई जा रही किसानी जमीनों की या  मौसम की मार और चैपट फसल में तबाह जिंदगियों के आंसुओं की? आज इस एक शव ने उसे थर्रा दिया। इस सैलाब में मुर्दा तो सिर्फ एक था पर बाकी सब भी हरकत के बावजूद उसे मुर्दा ही नज़र आने लगे। ये शोर चीखते हुए एक संवाद बुन रहा था जिसमें परेशान जि़ंदगियों के सच थे, कराहती पीड़ाएं थीं, और सरेराह अनगिनत मौतों के इल्ज़ाम थे, इल्ज़ाम उन पर जो आजीवन हर इल्ज़ाम से बरी थे।
                 तमाशबीन भीड़ में से अधिकांश को इन किसानों की तकलीफ कुछ सच लगी तो कुछ नाटक।  प्रखर ने महसूस किया जो मौसम यहां आते हुए उनके लिए रोमांस की कल्पनाओं को गुलज़ार कर रहा था वही मौसम जाते हुए इस कदर जानलेवा हो गया है। शहर से चंद किलोमीटर के दायरे में सच की शक्ल कैसी भयानक हो गई। उसे लगा क्या गलत कहा उस आदमी ने- एक ही जगह रहने वाले लोग किस तरह एक- दूसरे की जि़ंदगियों से अनजाने और बेगाने हैं। जो मरा उसके साथ बहुत कुछ खत्म हो गया पर जो जिंदा बाकी हैं उनका क्या? सब सोचकर प्रखर को इस रास्ते आते हुए गाए जाने वाले सभी मधुर गीत खंूखार लगने लगे। दूसरी तरफ संभव को ये चिंता खाए जा रही थी कि कहीं  देरी की वजह से समय न खत्म हो जाए और डीलर से मिलना न हो पाए।
   कुछ समय बाद धरना, पटरियों और सड़क के कुछ हिस्से में सिमटा दिया गया। एक-एक करके धीमी रफ्तार से ही सही गाडि़यां खिसकने लगीं। प्रखर के कदम घर की दिशा में लौट रहे थे। उसने गौर किया, सड़क के दोनों तरफ बची-खुची हरियाली का रंग अब हरा नहीं रह गया बल्कि सूखे खून- सा धूसर हो चला है। प्रखर जिस लो बजट के चक्कर में घर ढूँढने  निकला था आज उसे अपने आसपास सब लो ही दिख रहा था- विकास ,नीतियां, व्यवस्था और सबसे अधिक इंसानियत। 
                                                                                                                                                  
               
                 



  

गुरुवार, 14 मई 2015

पाखी पत्रिका के मई २०१५ के अंक में प्रकाशित मेरी कहानी तकसीम


                                                           
                                                            तक़सीम   

                                                              प्रज्ञा

ये शहर भी अजीब हैं न अनोखे? लाख गाली दे दिया करें रोज मैं और तू इन्हें पर इनके बिना तेरे-मेरे जैसों का कोई गुजारा है बोल? कितने साल बीत गए हम दोनों को यहां आए। अब तो ये ही दूसरा घर बन गया है हमारा। हम रहते यहीं हैं, कमाते-खाते यहीं, यारी-दोस्तियां भी अब तो यहीं हैं बस एक परिवार ही तो गांव में हैं। याद है न तुझे शुरू-शुरू में मन कैसा तड़पता था कि थोड़े पैसे जोड़ें और भाग लें अपने गांव। कुछ भी न सुहाता था मुझे तो यहां का। आज से कई साल पहले जब आया था तो कुंवारा था। होगा कोई सोलेह-सत्रह का। बस पूछ न ऐसा लगता था कि कोई रेला बह रहा हो शहर में। रेला भी कैसा कि बस सब एक-दूसरे को बिना पहचाने भागे जा रहे हों। हर समय अम्मी का चेहरा याद आया करता और खाने के नाम पे रूलाई छूट जाती। एक कमरे में चार-पांच हम लड़के। न कायदे का बिछौना, न खाना। पांच लोगों के कपड़ों-बर्तनों से ठुंसा एक जरा-सा कमरा। मजबूरी जो न कराए थोड़ा। गंदी- सी बस्ती, बजबजाती नालियां। अब तो फिर भी मोटर की सुविधा हो गयी है नहीं तो पहले दो-एक नल। बस... वहीं नहाना, पानी भरना। मार तमाम गंदगी और शोर-शराबा, आए दिन के लड़ाई -झगड़े।’’
‘‘ तो अब क्या सब खत्म हो गया है? गंदगी के साथ लड़ाई-झगड़े तो और बढ़े हैं बस्ती में। मर्द-लुगाई कुत्तों की तरह लड़ते हैं यहां। कौन से हीरे-मोती जड़े हैं जो सब चिपके हैं यहां से?’’
जमील को अनोखे की आवाज सुनाई ही नहीं पड़ रही थी बस होंठ हिलते दीख रहे थे। उसका मन अतीत के गलियारे में जो एक बार दाखिल हुआ तो समय आज से पीछे न जाने कितने वर्षों की यादों में खोने लगा।
‘‘मुझे नहीं जाना शहर अम्मा। यहीं फेरी लगा लूंगा मैं भी अब्बा की तरह। मना कर दे तू उनसे। पहले भी खालू के काम में क्या-क्या न सुनने को मिला था, भूल गई तू।’’
‘‘ न जमील, मेरे बस की नहीं है उनको समझाना। समझदार होके कैसी बातें करता है तू। देखता नहीं यहां क्या कमाई है। जिनके पास मौके की जमीने थीं वो सब हाईबे निकलने से अच्छे दाम कमाकर शहर चले गए। उनके रहते काम-धंधा ठीक चलता भी था अब फेरी के काम में वो बात कहां रही? कोई दिन ठीक बीत भी गया तो कई दिन के फाके। फिर कोई जमीन है नहीं हमारे पास जो जोते-बोएं, कमाएं-खाएं। जानता नहीं है रे तू हारी-बीमारी, ब्याह-शादी जीवन के सब तौर-तरीके निभाने पड़ते हैं। इस कमाई में दो पैसे बचाना तो दूर खाना मिल जाए बड़ी बात।... नहीं आज नहीं तो कल तुझे जाना ही पड़ेगा। मैं कुछ न कहूंगी उनसे।’’
उत्तर-प्रदेश में खतौली के पास छोटे से गांव का रहने वाला था जमील। न पढ़ा-लिखा और न ही जमीन-जायदाद वाला। उसे तो मुफलिसी में बीता बचपन भी बड़ा शानदार लगता। दिल में उमंग और दिमाग में अब्बा की जेब की राई-रत्ती चिंता नहीं। सारा दिन घुमक्कड़ी,पोखर में डुबकियां और खेल-कूद। ज़रा बड़ा हुआ तो अब्बा के साथ फेरी पर जाना और वहां भी मस्ती। घरों से निकले पुराने कूड़े-कबाड़ से उनके दिन जगमगाए रहते। पुराने कपड़े, जूते, बर्तन,कागज, खाट की पैबंद लग-लग कर घिस चुकी निवाड़ें, लोहा-लक्कड़ उठाने, बोरों में भरने में अब्बा की मदद करता था जमील। उन्हें बिकवाने कस्बे में जाता और फिर वहां से आकर अपनी पुलिया पर। बड़ा होते ही ये पुलिया उसका स्वर्ग हो गयी थी, जहां अशरफ, युसुफ, उमेश और रामफल के साथ उसकी महफिल जमती। दुनिया भर की गप्पें, हंसी-ठठ्ठे,मन के छिपे राज की साझेदारी, साथ जवान हो रही लड़कियों के किस्से-कल्पनाएं और सुनहरे जीवन के सपने। घंटों-घंटों ये पुलिया उनके सपनों से आबाद रहती। आपस में लड़ते भी थे पर जल्दी सुलह भी हो जाती।
            इस बार अम्मा-अब्बा पूरा मन बना चुके थे जमील को शहर भेजने का। बस रहमत चाचा का आना बाकी था इस बार जैसे ही आएं जमील उनके हवाले। अम्मा के मायके के रहमत चाचा कई बरसों  से दिल्ली में बसे हुए थे। उनके आने में अभी समय था। इधर कुछ समय से गांव में अजीब-सी हरकत दिखाई दे रही थी। अचानक गोधरा-गुजरात का शोर बढ़ रहा था। ठीक वैसे ही जैसे कई साल पहले मचा था। तब राम मंदिर बनना था और राममंदिर बनाने की जमीन के लिए बाबरी मस्जिद तोड़ी जानी थी। हिंदुओं ने एक रूपया-एक ईंट  की फरमाईश कर दी थी गांव भर में। कार-सेवा के लिए चंदे और लोग मांगे जाने लगे थे। गांव के कितने किशोर उस रेले में शामिल हुए उस दफा। इस बार शोर वैसा ही था और माहौल में सनसनी फैली थी।
‘‘ बदला तो हम लेके रहेंगे। छोड़ेगें नहीं। समझ क्या रखा है?’’- उमेश का स्वर बड़े दृढ़ निश्चय के साथ निकला।
अखबार और टी.वी. की खबरें गांव भर में फैल चुकी थीं। खबरों पर सवार जलजला गांव में दाखिल हो गया। गांव में हिंदू-मुसलमानों की संख्या बराबर थी पर देश में किसका पलड़ा भारी है हर कोई जानता था और इसी बीच हिंदू नौजवानों को अपना देश और अपना धर्म बचाने के रास्ते पर डाल दिया गया था। इनमें से कई भटके नौजवान अपने बचपन के दोस्तों से देश में रहने और देशभक्ति की कीमत अदा करने की बात करने लगे। उस दिन जमील, युसुफ से भी उमेश इसी हक से बात कर रहा था। पुलिया पर बैठना मिनट-मिनट भारी हो जमील और युसुफ के लिए। एक काला सन्नाटा तारी था वहां। उस सन्नाटे में वीर पुरूष की तरह प्रकाशवान था उमेश। रामफल परेशान था और जमील-युसुफ अकारण ही कठघरे में खड़े कर दिए गए थे। ये प्रकाश अंधेरे को भयभीत कर, और स्याह कर रहा था। उस दिन तो रामफल ने किसी तरह किस्सा निबटवाया पर उमेश की ठसक बरकरार थी। आज सुलह का रास्ता नदारद था।
            घर लौटते समय  जमील ने महसूस किया कि आतंक का साया उसके पीछे चला आया है। घर पहुंचा तो खालू और खाला आए हुए थे। खाला ने उसे देखते ही गले लगाकर माथा चूमा, शमशेर खालू की दबंग आवाज में किस्से जारी थे । खालू जबरदस्त किस्सागो थे और गांव से जाने के बाद भी उनका रसूख आज भी यहां कायम था। गांव के बड़े-बूढे़ बड़ा मान देते थे उनको। शमशेर जहांगीराबाद चला गया था अपने परिवार के साथ। उसका बढ़ईगिरी का धंधा जम गया था वहां। पहले कारीगर था अब तो सालों बाद छोटे-मोटे ठेके मिलने शुरू हो गए थे। एक बार जमील को भी ले गया था अपने संग पर उससे तो आरी ही न सधी। रोज़ साथ काम पर ले जाता शमशेर उसे। जमील को बिठा भी देता। जमील उठाई-धराई के काम तो कर देता पर लकड़ी न चिरती उससे। मालिक जब उसे ठलुआ देखता तो उसका भी पारा चढ़ता। हिकारत की नज़र ही नहीं हिकारत के शब्द भी जब मुक्त हो गए तो जमील का दाना-पानी उठ गया वहां से। इस काम में मन नहीं लगा जमील का।
            खाने के बाद खालू ने भी बाबरी मस्जिद के समय की बात उठा दी।
‘‘वोट की राजनीति में अब तक पीसे जा रहे हैं भईया। मुसलमान होने का कर्ज चुकाओ और चुप रहो-यही तो सिखाया जा रहा है न। हम कुछ न बोलें तो देशभगत और बोलें तो पाकिस्तानी। कौन है यहां पाकिस्तान का जरा बताओ? हमारे-तुम्हारे बाप-दादा तो इसी मिट्टी के रहे और बोलो हम-तुमने कभी देखा है पाकिस्तान? कभी जाने की सोची है वहां? ’’ खाट पर औंधे लेटे खालू अब्बा से बोले।
‘‘ और मस्जिद तो अल्ला का घर ठहरा फिर उसे क्यों तोड़ा था उन्होंने? सैंतालीस के तक्सीम किए आज भी अलग ही पड़े हैं हम।’’ अब्बा के सवाल में छिपे डर को पहली बार महसूस किया जमील ने। पर तक्सीम की बात जमील को कुछ ज्यादा समझ में नहीं आई। वह सोचने लगा ‘‘सन सैंतालीस.... कित्ते बरस हो गए होंगे चालीस-पचास या उससे ज्यादा पर तक्सीम.... बंटवारा...?... और आज...आज क्यों तक्सीम की बात कर रहे हैं अब्बा? उमेश की आज की बात से पहले तो मुझे रामफल और उमेश अपने से अलग न लगते थे , मुझे क्यों नही दिखा ये बंटवारा?’’
‘‘हक की लड़ाई है भाई! वरना हमारे गांव की मजार पर हिंदू मन्नत नहीं मांगते। धूप-अगरबत्ती न जलाते? बाबरी के बाद भी। इतने सालों में हुआ यहां कोई झगड़ा तुम्हारे देखे? और वहां जहांगीराबाद का ही सुन लो न जबसे गया हूं सब ठीक ही चल रहा था कोई झगड़ा न था धर्म के नाम पर। बाबरी मस्जिद के समय की बात है कुछ बाहरी लोगों ने हिंदू-मुस्लिम के नाम पर भड़का दिया। अब जान लो कि ये सदियों का नाजुक मामला ठहरा और सदियों से भड़कते आए लोग फिर भड़क गए। दोनों भूल गए बरसों पुराने अपने रिश्तों को और मार-पीट पर उतारू हो गए। जवान लड़के जिनके न कोई काम न धंधा गुटबाजी में लग गए और भड़काने वाले न इधर कम थे न ही उधर। दोनों तरफ हथियारों की होड़ मचनी शुरू हो गयी। इन जवानों के मन में भड़की आग देखके परधान को लगा कि अनर्थ हो जाएगा। दंगा हो गया तो घरों के चिराग बुझकर मातम में बदल जाएंगें। अरे बड़े तरीके से संभाला भइया उसने तो। मार-काट का अंदेशा होने पर उसने कही कि ‘जब लड़के ही फैसला करना है तो लड़ो पर खबरदार कोई बाहर का आदमी न लड़ेगा। आज जाओ सारे गांव वाले, शाम को मैदान में अब लड़कर ही फैसला ले लो।’’
शमशेर की बात को सब दम साधकर सुन रहे थे। जमील के मन में वैसी ही उथल-पुथल मच रही थी जैसे उस दिन गांव भर के लोगों में मची होगी। उस दिन शाम तक कितने घर झंझावातों से हिल गए होंगे? कितनी खलबली, कितनी तैयारियां और फिर जीता कौन? जमील का मन निचावला न था, उसकी आंखों से ‘फिर क्या’ का इशारा पाकर शमशेर ने सांस खींचकर दोबारा कहानी का सिरा आगे बढ़ाया-
‘‘ तो भइया हुआ ये कि जहां शाम को मार-काट की बन आई थी हुआ एकदम उलटा ही। मांआंे-बापों ने मुसीबत समझ कर धमका दिए अपने लाडले। बड़ों ने समझदारी दिखाई जनम-मरण के बरसों पुराने साथ ने सबको चेता दिया और फिर हाय-हत्या से उजड़ जाने वाले सबके काम-धंधों पर मंडलाता खतरा नहीं था क्या? और लो शाम को चिडि़या का बच्चा तक न फटका मैदान में। परधान की बात का ऐसा असर पड़ा कि सबके होश ठिकाने आ गए। आखिर कौन चाहता है बेबात की लड़ाई। रोज हिंदुओं को हमसे काम पड़ता है और हमारा उनके बिना गुजारा नहीं। इत्ती पुरानी दोस्तियां और लेन-देन ठहरा। जानते हो जब काम से दिल्ली जाता था बड़े ठेकों के लिए तो कितने पंडत दोस्त शहर आते और फरमाईश से मीट-मुर्गा पकवाते। झककर खाते थे सब। बस जहांगीराबाद में तो उस दिन सब कुशल की अल्ला और राम ने। अब फिर ये नई मुसीबत है गोधरा की।’’
आखिरी बात को अनसुना करते हुए जमील के मन को अपार संतोष मिला। ऐसा हौसला जागा कि अभी जाए उमेश के घर जाए बताए उसे पूरी कहानी। उसका मन को जहां राहत मिली थी , उसने महसूस किया कि अब्बा पहले से तो जरूर कुछ ठीक लग रहे हैं पर उनकी चिंता मिटी न थी अब तक। 
            अगले दिन पता चला कि उमेश कई और लड़कों के संग गायब है। रामफल ने बताया उस पर भी संग चलने का बड़ा दबाव था लेकिन रामफल पर घर की सैंकड़ों जि़म्मेदारियां थीं तो उसने बड़ी मुश्किल से जान छुड़ाई । गांव में यों तो सब शांत दिखता था पर धरम की बातें खुलकर नहीं होती थीं अब। पहले की तरह। एक बिना लड़ी लड़ाई चल रही थी जो ज्यादा खतरनाक थी। एक भारी-जानलेवा सा माहौल। इन दिनों पुलिया भी जमील को न सुहाती। उमेश था नहीं और युसुफ और रामफल के काम अचानक ही अधिक बढ़ गए थे। यों तो जमील पहले भी पुलिया पर कई बार एकांत का सुख उठा चुका था पर अब वह एकांत डराता और हौआ- सा खड़ा करता । इस बीच उमेश लौट आया और दिन-दिन भर हिंदू धर्म की महागाथाओं के किस्से सुनाया करता । साफ पता चल रहा था कि किसी बड़े हिंदू जलसे में शामिल होकर लौटा है। अपने धरम की जयजयकार और बाकी सब को दुत्कार रहा है। जमील जैसों के लिए गहरी नफरत और हिंसा उसकी आंखों में ऐसे ही नहीं उग आई थी। आज कौन कह सकता था कि ये जिगरी दोस्त थे कभी? उससे आमना-सामना होने से जमील भी कतराने लगा अब तो। कहीं मन न लगता था। युसुफ से भी एक दिन अच्छी कहा-सुनी हो गयी उसकी।
‘‘ अरे चल न मेरे संग। जब ये लोग अपना धरम बचाने को कूद रहे हैं तो हमें भी एक होना होगा न। जब मार-काट, आगजनी के इल्जाम धरे ही जा रहे हैं हम पर तो पूरा करके ही दिखा देते हैं... चल न... जाकिर भाई बहुत सच्ची बातें बोलते हैं । आखिर को सगे हैं हमारे। चल बुलाया है उन्होंने। ’’
युसुफ के शब्दों से आग लग गई जमील को। जाकिर के मन में भरे जहर से वो वाकिफ था फिर जाकिर यों भी उसे पसंद न था। मुसलमान लड़कों को घेरकर अल्ला के नाम पर उनका लीडर बना रहता था जाकिर। जमील ने युसुफ को समझाने की को़शिश की पर बात-बात में मामला बिगड़ गया। जमील की मर्दानगी को चुनौती देता युसुफ अपनी राह चला गया। रोज ही एक उदास सुबह से शुरू हुआ जमील का दिन निराश रात में बीतने लगा। जहां से जाने की कल्पना उसमें अजीब सी सिरहन भर देती थी आज वो इस जगह से भाग जाने की सोचने लगा। और फिर सब कुछ भांपकर मां-बाप ने उसे रहमत के हवाले कर दिया। रहमत उसे दिल्ली ले आया।
            ‘‘देखो बेटा अब जो भी है यही सच है कि तुम अब तरीके से कमाने की सोचो। मां-बाप का सहारा बनो। रहने-ठहरने की थोड़ी बहुत रकम दी है तुम्हारे अब्बा ने पर खुद न कमाओगे तो खाओगे क्या और घर क्या भेजोगे? कमरे का इंतजाम कर देंगे। कई जन साथ रहेंगे। मिलजुल के रहते हैं यहां तो तुम भी रहो। फेरी के काम में मन लगता है न तुम्हारा तो एक जगह बात कर ली है। कल लिवा ले चलेंगे। अपना काम समझो और करो। कोई परेशानी होगी तो हम हैं ही यहां।’’
नई जगह को अभी समझ नहीं पाया था जमील पर जि़म्मेदारी समझ आ गई थी। यों जीवन से बहुत बड़ी उम्मीदें तो नहीं थीं उसकी। हां रहे थे कुछ सपने जो पुलिया पर बैठे बड़े रंगीन और शानदार लगते थे। पर अब न तो पुलिया रही न पुलिया के सपने। पुलिया की हवाई कल्पनाओं के बरक्स आज कई ठोस हकीकतें जमील के आगे थीं जिनका सामना उसे अब अकेले ही करना था।
‘‘ रद्दी..ई.ई..पेपर’’ की आवाज से गलियों-गलियों घबराता-सा घूमने वाला जमील थोड़े ही दिन में सब ठिकानों का आदि हो गया। घरों, मोहल्लों की उसे सही पहचान हो गयी थी। भाव-तौल का पक्का, देखने-सुनने में अच्छा और फालतू किसी से बोलना नहीं। गंदी बस्ती में रहने के बाद भी साफ-सुथरा बनके रहता। यों रोज नहाने की आदत तो उसकी बचपन से ही थी। यार-दोस्त छेड़ते-‘‘अरे पिछले जनम में बामन रहा होगा तू?’’ रद्दी बेचने के ठिए भी उसने जल्दी ही जान लिए। रोज के सामान को रोज ही ठिकाने लगाने का नियम बना लिया था उसने। कुछ बरसों में काम जमा लिया जमील ने। अब पैदल नहीं एक साइकिल थी साथ में और हाथ में एक घड़ी भी। शहर की हवा उसे भी छू रही थी। जमील को ये छुअन भली लगती पर हवा में बहना उसे पसंद न था। शहर की अपनी छूट भी थी कि किसी को उसके धरम से कुछ लेना न था, सबको अपने काम से मतलब। संगी-साथियों का भी धर्म मजदूरी था और जात दिहाड़ी मजदूर थी। अपने-अपने घरों से उखड़कर अब सबने अपने ये जो छोटे-छोटे घर बना लिए थे तो सब होली-ईद मिलकर मनाते थे। हां धरम के नाम पर एक-दूसरे का खुलकर मजाक उड़ाते और पूजा-पाठ का अगर समय निकलता तो वो भी कर लिया करते।
‘‘अबे पहली शादी कब कर रहा है तू?’’
‘‘क्या मतलब?’’
‘‘पहली करेगा तभी तो तीन और कर पाएगा न यार। तुम्हारे में तो खुल्ली छूट है।’’
‘‘ साले इस कमाई में एक को पाल लूं तू चार की बात करता है। हमने तो नहीं देखी अपने यहां किसी की चार शादी । तूने देखी है क्या? ’’ मजा लेने के लिए यों सब हंस लेते ।
अचानक एक दिन मोहल्ले की शांत- सी जिंदगी में हलचल मच गई। रात ही रात में किसी ने कोठियों के आगे खड़ी दो बड़ी गाडि़यों के टायर और एक का स्टीरियो निकाल लिया। डाॅ. यादव की गाड़ी तो एकदम नई थी तो गुप्ता जी की गाड़ी भी चंद साल पुरानी थी पर टायर अभी बदले गए थे। सुबह से ही पुलिस की गाडि़यां खड़ी थीं और पूछताछ चल रही थी। ड्यूटी पर तैनात एक गार्ड भी आज गायब था।
‘‘ एक दिन में नहीं हो सकता ये कारनामा साहब। बड़े दिनों की प्लैनिंग है।’’
घटनास्थल पर मौजूद लोग आपस में बतिया रहे थे।
‘‘ गलती आप सबकी है। मैं कितनी बार कहा पर आप लोगों ने ध्यान नहीं दिया। कभी रात ही रात में नालियों पर ढके, ढक्कन गायब हो रहे हैं। कभी एक-एक करके बच्चों की मंहगी वाली साइकिलें। पर किसी ने परवाह की? बैठे रहो जब तक आग आपके घर को नहीं लगती। पर फिर ये शिकायत न करना कि कोई नहीं आया मदद को। हम क्या पागल हैं कि आज जब कोई हमारा साथ नहीं दे रहा तो हम कल उसके साथ खड़े होंगे ?’’ गुस्से में गुप्ता जी क्या बोले जा रहे थे उन्हें होश नहीं था ।
सारे लोगों को कठघरे में खड़ा कर दिया था गुप्ता जी ने और लोगों पर भी अब नैतिक जिम्मेदारी आ गई थी । लोग कुछ कर तो सकते नहीं थे पर अपनी बातों से गुप्ता जी और डॉ. साहब को ढाढस तो बंधा ही सकते थे। और सबसे बड़ी बात लोग इस समय अपनी पूरी संवेदनशीलता के साथ खड़ा दिखाई देना चाहते थे। चोरी की इस वारदात ने सबको सचेत कर दिया था। सबको अगला नम्बर अपनी ही गाड़ी का आया लगने लगा।
‘‘काम तो उसीका है जिसने यहां घरों को बड़े ढंग से ऑब्ज़र्व किया है। और ये बात भी है कि गार्ड ने उसकी मदद की है।’’ लोगों ने दोनों की परेशानी को अपनी परेशानी मानकर बोलना शुरू किया।
‘‘आज गाड़ी पर हाथ साफ किया है, कल घरों पर करेंगे देख लेना। ’’
 लोगों के तनाव और बेचैनी के साथ मुहल्ले में आमदरफ्त भी बढ़ गई थी। रोज के काम तो आखिर अपनी ही गति से चलने थे। पुलिस तफ्तीश अभी जारी थी। मोहल्ले में काम करने वाली महरियों से लेकर दूध, सब्जी वाले, घरों में चिनाई-पुताई करने वाले मजदूरों के संग ‘रद्दी पेपर’ की हांक लगाता जमील भी रोज की तरह समय पर आ गया। भीड़-भाड़ देखकर सब जानने के लिए वह भी भीड़ का हिस्सा बन गया। डॉ. साहब के रसूख और पुलिस महकमे में खासी जान-पहचान से इनक्वायरी की गंभीरता के मद्देनज़र पूछताछ के लिए कुछ लोगों को निकट के थाने में ले जाया जरूरी था। पूछताछ के लिए कुछ लोगों के साथ जब जमील का नाम लिया गया तो वो सकते में आ गया।
‘‘मैं क्यों? मैंने क्या किया है? मेरा क्या लेना-देना इस सबमें?’’ उसके मन ने कई सवाल किए। पर जाना तो था ही। घबराहट के बावजूद उसकी मुद्रा बेधड़क थी ,कोई अपराध नहीं किया था उसने।
‘‘सवाल ही तो पूछेंगे न पूछ लें। मैं कोई मुजरिम थोड़े ही हूं। हां दिहाड़ी तो खोटी होगी आज।’’ आगे की घटना का अनुमान लगाकर उसने अपने मन से ही सवाल-जवाब का क्रम तैयार किया।
थाने में पूछताछ के दौरान जब जमील का नम्बर आया तो वह पूछे गए सवालों का सही-सही जवाब दे रहा था। इतने में  डॉक्टर साहब ने चौकी पर तैनात थानेदार से कहा-
‘‘यू नो दीज़ पीपुल... दे आर बोर्न  क्रीमिनल्स ।’’ अंग्रेजी  उसके पल्ले नहीं पड़ी पर हाव-भाव से समझ गया बात कुछ उसके विरोध की ही है। डॉक्टर साहब के कथन पर थानेदार ने बड़ी तेजी से अपना सर हिलाया और सवाल जारी रखे-
‘‘ तो ये बता कहां बेचता है तू अपना माल? पुराना कबाड़ ही बेचता है या गाड़ी के टायर-टूयर भी? और ये बता स्टीरियो कहां बेचता है ?’’ जमील की बलिष्ठ शारीरिक संरचना को ताड़ते हुए थानेदार बोला।
हैरत में पड़े जमील को जैसे सुनाई देना बंद हो रहा था। अपनी पूरी शक्ति से वह अपने कान और ध्यान सवालों पर लगाने की कोशिश करने लगा। शरीर में जैसे खून का दौरा किसी दबाव से रूक गया हो और उसकी सारी चेतना जड़ता में तब्दील होने लगी। बिना सबूत,गवाह, कोर्ट-कचहरी के जमील को सीधे-सीधे दोषी करार दिया जा रहा था। इस अपमान के बावजूद अपनी जड़ होती जा रही इंद्रियों को जबरन सचेत करते हुए, सामने बैठे लोगों से कोई सवाल न करते हुए भी उसे जवाब देना जारी रखना था। उसकी नजर में यही उसके बेगुनाह होने का अकेला रास्ता था।
‘‘जी मैं तो सिर्फ रद्दी-लोहा,प्लास्टिक ही उठाता हूं घरों से....ऐसी चीजंे कहां।’’ टूटे हुए मन से जमील ने कहा।
‘‘ और जो उठाएगा भी तो क्या तू इतना संत आदमी है कि हमें बता देगा? और कौन-कौन साथ हैं तेरेइस धंधे में?..बता?’’ थानेदार की आवाज गरजी ।
साथ बैठे बेलदार प्रकाश से रहा न गया-‘‘साब! ये बेकसूर आदमी है। मैं जानता हूं इसको। मेरे साथ रहता है।’’
 मुसीबत के वक्त प्रकाश के इन शब्दों ने सच में अंधेरे को चीर दिया। पर अगले ही क्षण थानेदार हरकत में आ गया। सीट से उठकर एक भरपूर थप्पड़ पड़ा प्रकाश के गाल पर।
‘‘ अबे तू क्या राजा हरिश्चंदर के खानदान का है?, जो तुझ पर विश्वास कर लूं। और साले तुझे कौन जानता है यहां? बिहार से आया है या यूपी का है? तू भी इसके संग शामिल है क्या चोरी में?’’ प्रकाश थानेदार का मुंह ताकता रह गया। गाल पे पड़े तमाचे से उभर आईं लाल परतों के किनारे खौफ की सफेद परत भी खिंच गई थी। जमील सब समझ रहा था ये थप्पड़ उसीके नाम का है जो प्रकाश को पड़ा है। लंबी,उबाऊ कार्यवाही से संतुष्ट होकर डॉक्टर साहब चल दिए। आज हॉस्पिटल  में उनकी ओ.पी.डी. थी और गुप्ताजी को भी पुलिस के आसरे न बैठकर गाड़ी दुरूस्त करानी थी। थानेदार ने इतना सच तो बता दिया था उन्हें कि कुछ मिलने की उम्मीद न रखें पर समझौता इस बात पर हुआ कि इन लोगों को सस्ते में न छोड़ा जाए । इनको मिली सजा, सबक बने औरों के लिए। कुछ मजदूर भी भेज दिए गए पर जमील, प्रकाश और गार्ड को नहीं भेजा गया। अपमान के साथ-साथ आज की दिहाड़ी मारे जाने का भी जमील को दुख था। और अब कल से कौन बुलाएगा उसे अपने घर कबाड़ लेने? इस थुक्का-फजीहत से निकल भी गया तो थाने की कहानी कई दिन चलेगी और फिर डॉक्टर साहब और गुप्ता जी अब क्या उसे जमे रहने देंगे वहां? कितने सवाल जमील पर अपना शिकंजा कसते ही जा रहे थे। और सबसे बड़ा सवाल तो यही था इस बेबात की कैद से कब छूटेंगे?
            उन तीनों को एक कोने में मुजरिम की तरह बिठा दिया गया। बरसों पहले उमेश के चेहरे पर जिस नफरत को जमील ने पाया था वही आज और धारदार होकर थानेदार के चेहरे पर उग आई थी। एक नाम, सिर्फ एक नाम की वजह से जमील मुख्य अपराधी मान लिया गया था और उसके साथ बैठे दो लोग अपराध को अंजाम देने वाले उसके साथी के रूप में बिठाए गए थे। उसके मन में बरसों पहले की अब्बा की बात लहर की तरह उठी ... तक्सीम। जब शहर आया था तो उसने सोचा था यहां किसी को किसी के जात-धर्म से कुछ लेना-देना नहीं है। राजधानी का खुलापन उसने इसी रूप में महसूस किया और सराहा था। पर आज की घटना ने उसके सामने एक बड़ा सच ला खड़ा किया कि बातें जब तक ढकी-छिपी रहें सब बहुत संुदर दिखाई देता है। परत उघाड़ दो तो हर जगह एक बजबजाता नाला ही है और कुछ नहीं। अपमान और आतंक की परतें तनिक शिथिल हुईं तो भूख की मारी आंतों ने मुंह उठाया। पर यहां कौन सुनेगा? सुबह से शाम होने को आई। सब तो पूछ डाला, अब क्या? इतने में रहमत चाचा के साथ ठेकेदार संतोष आता दिखाई दिया। संतोष का आना-जाना है इन थानों में। कहीं कोई अवैध निर्माण करवाता है तो मालिकों से थाना-पुलिस की झोलियां वही तो भरवाता है। जमील और प्रकाश समझ गए कि यहां से छूटे मजदूरों ने ही ये दूर की कौड़ी खोज निकाली है। उम्मीद और बेचैनी की कसमसाहट माथे पर खिंचती चली जा रही थी। आखिरकार वही हुआ। यहां भी संतोष ने पुलिस की झोली भरवाई। पूरे दिन की उनकी ‘मेहनत’ जाया नहीं हुई। अच्छी कमाई हुई।
            ‘‘चाचा अब न रूक सकूंगा मैं यहां।’’ शहर में सब कुछ खत्म हुआ मानकर एक गहरी हताशा में जमील ने कहा।
‘‘ कहीं भी चला जा बेटा तेरा सच तो संग चलेगा ही। फिर अब गांव में क्या धरा है तेरे लिए? और शहर, ये हो या कोई और क्या फर्क पड़ता है। थोड़े दिन में भूल जाएंगे सब। तू कोई और मोहल्ला पकड़ लियो।’’ रहमत चाचा ने समझाते हुए कहा।
‘‘लोग भूल भी जाएं चाचा पर मैं क्या भूल सकूंगा?’’ सवाल वाजिब था और रहमत से जवाब देते न बना।
  कुछ दिन उदास रहने के बाद जमील सचमुच गांव चला आया। घटना के चंद दिन हताशा में ज़रूर बीते पर उसे ये समझा गए शहर ही अब उसका अंतिम ठिकाना है। अच्छा-बुरा चाहे जैसा। घर की गरीबी, गांव में नौजवानों के लिए पसरी बेकारी, दिन ब दिन बढ़ती जिम्मेदारियों की सोच ने जमील की जि़ल्लत को कहीं बहुत दूर धकेल दिया। फैसला लेने के बाद भी उसका एकदम से संयत और सहज होना असंभव था। थाने से जान छुड़ाने के चक्कर में रूपये भी काफी खर्च हो गए थे। गांव वापिस लौटकर उसे फिर वैसी राहत मिली जैसी कभी यहां से शहर आकर मिली थी। समय की इस अजीबोगरीब शक्ल-सूरत को वह बनते-बिगड़ते बड़े नजदीक से देख रहा था।
घर में उसने शहर का सच किसीसे नहीं कहा। सबने माना घर की याद के चलते जमील वापिस आया है पर उसकी उदासी किसी से छिपी न रह सकी। अब्बा रोज ही उसे यार-दोस्तों के घर जाने और गांव के बुर्जगों से मिलने की बात कहते। ऐसा नहीं है कि जमील को पुराने दोस्तों से मिलने में कोई एतराज था। वैसे भी जिस तरह समय की धरती पर तीखे पत्थरों के नुकीले कोने पानी की गोद में पड़े रहने से अपना नुकीलापन खो बैठते हैं ऐसा ही जमील के साथ हुआ था। उमेश और युसुफ की बात वह लगभग भुला चुका था। अब तीनों घर-परिवार वाले हो चले थे और उमेश आज भी हिंदू लड़कों के लीडर के रूप में ही जाना जाता था। मिलने पर सबके बीच कटुता के निशान नहीं थे पर रामफल को छोड़ सबमें एक झिझक बाकी थी जो पुलिया के दिनों को हरा नहीं होने दे रही थी। घूमते-घामते जमील पुलिया पर भी हो आया। पुलिया आज भी किशोर-जवान दोस्तों का अड्डा थी। वहां आज भी कोई चिंता, दुख, परेशानी और तकलीफ नहीं थी बस चेहरे बदल गए थे। जमील को लगा जैसे इन चेहरों ने वक्त की धारा को उसके लिए पीछे मोड़ दिया है। कुछ क्षण अतीत में जीकर जब जमील लौटा तो सब नदारद था। चेहरे की उदासी कुछ और बढ़ गई। इधर उसने पाया जाकिर का रूतबा भी बढ़ चला था गांव में। जाकिर भाई खासी इज्जत से नवाजे जाने लगे थे। अल्लाह और ईमान की राह का हवाला देकर अच्छा रूआब जमा लिया था उन्होंने। अब्बा ने कई दफा उनसे मिल आने की बात कही पर जमील का मन न माना । उसकी याद में अब भी जाकिर का सच जिंदा था। और आज के शांत माहौल में भी जाकिर और उमेश के उस समय के चेहरे याद आते ही उसका मन उचाट हो जाता था। उसे लगता ऐसे ही लोग जिम्मेदार हैं जो इंसान को उसकी मेहनत, काबीलियत और ईमानदारी से नहीं सिर्फ उसके धर्म से जानना पसंद करते हैं और समय आने पर दूसरे की पतंग काटना जिनका पसंदीदा खेल है। और इस खेल के सख्त नियम हैं क्रूरता और मनमाफिक बर्बरता, जिसमें दूसरे के लिए कोई रिआयत नहीं। शहर की घटना को जब इस सबसे जोड़कर देखता तो पाता ये चेहरे वहां भी इसी रूप में है- ‘ये खेल है कबसे जारी’।
 जवान बेटे की उदासी जब किसी भी तरह, कई दिन तक दूर नहीं हो सकी तो अम्मा को एक ही उपाय सूझा-उसकी शादी। शमशेर खालू ने पहले ही लड़की देख रखी थी और वो मां को पसंद भी थी।
            ‘‘ वैसे अभी तो नहीं पर जैसा तुम कहो अम्मा..आज नहीं तो कल करनी ही है शादी। ’’ जीवन का एक और बड़ा काम निबट जाए कुछ यही अंदाज था जमील का। और लो बात पक्की हो गई।
‘‘ बेटा तू ले जाना सोनी को अपने साथ शहर। यहां दिल न लगेगा उसका तेरे बिना। और वो यहां रही तो तू भी भगा-भगा आएगा हर दूसरे दिन।’’ शहर के लिए निकलने से पहले मां ने जमील से कहा।
‘‘ नहीं अम्मा वहां,कहां?...तेरे पास ही रहेगी।’’
जमील का गंभीर और निश्चयात्मक स्वर सुनकर रेशम भी सकते में आ गई। लड़के की आवाज में शादी को लेकर खुशी की एक धड़कन तक नहीं मिली उसे। चुप रहना ही उसे ठीक लगा इस वक्त। जमील के दिमाग में पहले भी काई उलझन नहीं थी अपनी होने वाली बीबी को लेकर। शहर की दमघोंटू,गंदी बस्ती उसे यों भी इंसानों के रहने लायक नहीं लगती थी। फिर काम पर जाने पर पीछे सताने वाली फिक्र के बारे में उसने पहले ही गौर कर लिया था। बाद मे थाने की घटना ने तो उसके निर्णय पर पक्की मोहर लगा दी । गांव में रहेगी तो सुरक्षित रहेेगी वहां के मुकाबले। जमील ने ठान लिया।
            शहर आकर जमील ने दोबारा काम जमाया। रहा जमुनापुरी  मंे ही प्रकाश, अनोखे और सुनील के साथ पर काम का मोहल्ला बदल लिया। साथ रहने वाले अनोखे ने बड़ी मदद की। इस बीच जमील की  शादी हो गई और कुछ समय बाद वो एक बेटे का बाप बन गया। अब जीवन के सारे सुख उसके हिस्से में थे। बात-बात पर हंसता और बेबात पर भी उसकी हंसी न थमती। अब उसे दोगुनी ताकत से कमाना था। एक अच्छा जीवन, भाई-बहनों की जिम्मेदारी, बेटे की सही पढ़ाई-लिखाई और बहुत से अरमान थे उसके। सोनी ने उसकी जिंदगी में उमंगे भर दी थीं। शहर वापिस आकर जमील ने अनोखे की मदद से एक बड़ी सोसायटी का काम उठा लिया। अनोखे भी उसी सोसायटी में माली का काम करता था। नए काम की शुरूआत के साथ पिछले सारे अनुभवों को जमील ने सिरे से दरकिनार कर दिया था। बस अब उसे अपना काम पूरे ईमान से करना था। इधर उसने पाया कि राजधानी में चुनाव के बाद हवा कुछ बदल चली है।
‘‘ जय धरती मां जय गऊ माता’ के शब्दों पर हलचल सी मच जाती सोसायटी में-
‘‘अरे गौ-ग्रास वाला आ गया। भाग के जा और वो रात की रोटी दे आ।’’
ऊपर के माले से तुरंत भागकर न आ पाने वाली थुलथुल काया बीबीजी महरी को तुरंत दौड़ाती। आस-पास कई लोग बड़े नियम से अपना धर्म निभाने लगे थे। जमील सोच में पड़ जाता- हमारे गांव में तो पहली-पहली, ताजी रोटी निकालकर लोग खुद गाय को खिला आते थे। बिना किसी गाड़ी और भोंपू के शोर-शराबे के। पर आज आने वाली ये गाडि़यां तो तेज गानों के साथ गाय का गुण गाती फिर रही हैं।  जमील को समझने में बड़ी दिक्कत होती कि गौ-ग्रास लेने का ये कैसा तरीका है। और अगर ऐसा करना ही है तो शांत तरीके से मांगा जाए यह दान। उसने आस-पास भी गौर किया तो पाया ये गाडि़यां तो अब हर सोसायटी-मोहल्ले में आ रही थीं। शुभ अभियान के नारों, भाषणों और गीतों के साथ। मंदिरनुमा शक्ल की गाडि़यों में मंदिर की तरह ही घंटी लगी थी। नीचे चमकदार स्टील के दो ड्रम सजे थे। एक बात और जो वो सोचता कि जो लोग रोटी और खाने की अन्य चीजें न भी दे पाते थे उन सबके दिमाग में अगले दिन दान के लिए तैयार रहने की घंटी तो बज ही जाती होगी। ये गाडि़यां कौन से मकसद से आ रही हैं जमील समझ नहीं पाता। वैसे भी इन गाडि़यों की ड्यूटी दिल्ली भर में लग रही थी। पिछली सरकार ने नगर-निगम की कूड़ा बटोरने वाली गाड़ी ‘आपके द्वार पर’ खड़ी करवाई थी जिसकी आवाज गली-मोहल्ले में रोज गूंजती थी। नई सरकार आने के बाद से उत्साहित गौ रक्षक समिति ने उसी तर्ज पर गौ-ग्रास की रिक्शानुमा गाडि़यां उतार दीं। जमील हर दिन हिसाब लगाता कि पूरे दिल्ली भर में ऐसी गाडि़यां बनाने-चलाने का कितना खर्च आता होगा और ऐसी ढेर सारी गायें कहां बंधी होती होंगी जो इस खाने को खाती होंगी? उसे तो आज भी अपनी बस्ती और आस-पास के इलाकों में घूमती-फिरती गायें कूड़े के ढेर में मुंह मारती दयनीय और कुपोषित ही दिखाई देतीं।
सोसायटी में अधिकांश परिवार हिंदू थे । जहां तक संभव होता जमील अपना नाम, धरम बताए बिना ही काम चलाता।
 ‘‘राम-राम जी’’ जैसा उसका सम्बोधन जहां लोगों को ज़हनी तौर पर संशय की सीमाओं से मुक्त करता  वहीं उसके खुद के लिए जैसे ये राम-नाम एक ढाल बन गया था। अपने बचाव में एक हथियार सरीखा। जो लोग उसे नाम से जानते वो उसके इस सम्बोधन से खुश होते।
‘‘आया न सही राह पर। यहां रहना है तो हम रहते हैं वैसे ही रहना होगा। हमारी तरह राधे-राधे बोल या फिर जय राम जी की। ’’
शेष लोगों के लिए तो वह केवल कबाड़ीवाला ही था। उन्हें इतनी फुर्सत ही कहां थी जो उसका नाम जानते और उसके बारे में। अधिकतर घरों में तो वैसे भी ये काम  घरेलू नौकरों के ही जिम्मे थे। फिर तौल के पुराने तराजू भी अब अनुपयोगी होकर किसी कबाड़ का हिस्सा हो चुके थे। स्प्र्रिंग बैलेंस जैसे छोटे से औजार की बदौलत अब जल्दी से कबाड़ को बोरी में भरकर उसमें हुक फंसाकर बोरे को अपनी समूची ताकत से जमील उठा लेता। स्प्रिंग बैलेंस का कांटा किलो के निशान के आगे रूक जाता। जितने किलो के हिसाब से तय होता उतने पैसे जमील हिसाब लगाकर तुरंत चुकता कर देता। शुरू से ही घुलने-मिलने की आदत नहीं थी उसकी। शरीर से ताकतवर दिखता था पर इधर उसने अपनी खास भंगिमा से उसे भी कतरने की कोशिश की। दोनों हाथ पीछे की ओर बांधकर एक फर्माबरदार मुलाजिम की मुद्रा और ढीले-ढाले कंधों में गर्दन झुकाकर चलना। कमीज को पैंट के अंदर डालकर कभी चुस्त दिखने की कोशिश नहीं करता। शरीर की सारी मजबूती को इस भंगिमा ने जैसे उपेक्षणीय बना दिया था। काम बचा-बना रहे, जमील इसके लिए बड़े सचेत प्रयास करता। उसके ऐसा करने के पीछे वो चेहरे भी नुमायां थे जो उसे ऐसा करने पर बाध्य करते। एक कामवाले की औकात को अपनी बेबाक नज़रों से हरदम तौलते।

      काम से फारिग होते ही वह पार्कों  में काम करने वाले अनोखे के संग बैठ जाता। अनोखे  यहां माली का काम करता था। कड़ी मेहनत और मजदूरी कम। वो तो ड्यूटी के बाद कुछ घरों में उसका अपना काम था गमलों के रख-रखाव का नहीं तो गुजारा मुश्किल था। बातून अनोखे समझदार था। जमील का गार्जियन बनकर रहता था सोसायटी में-
‘‘क्यों फालतू काम करता रहता है बे तू इन लोगों के। जब देखो ऊपर सामान चढ़ाना है कबाड़ी वाले को भेज दो। अरे जरा ये कर दे और वो कर दे... किसी का टाईम खोटी हो इनकी बला से।’’ अनोखे की इस बात से जमील अपने आज में लौट आया।
‘‘कोई नहीं थोड़ी देर के कामों के लिए क्या घबराना। और कौन सी ये सरकारी नौकरी है हमारी? दो काम फालतू करेंगे तो कोई न निकालेगा और गलत भी न सोचेगा। क्यों? बात का सिरा पकड़कर जमील ने कहा।

‘‘इस फेर में न रहियो तू। जिस दिन निकालना होगा तेरा पिछला किया-कराया काम न आएगा देख लियो। तू किसलिए करता है, जानता हूं सब। पर अच्छाई का जमाना नहीं है। फिर हम जैसों की कोई यूनियन-वूनियन कहां जो बचा ले। हमसे सही तो ये माईयां हैं बर्तन-झाड़ू वालीं। पैसे बढ़वाने होते हैं तो सब जनी एक हो जाती हैं। पर हमारा....जानता है छत्तीस नम्बर वालों ने दशहरे के दिन कहा भई रावण बनवा दे बच्चों का। अब बता मैं क्या रावण का कारीगर हूं जो बनवा दूं? दो घड़ी हमारा सुस्ताना भी इन्हें बर्दाश्त नहीं। साफ मना कर दी मैंने। तू भी कर दिया कर।’’ कहने को कह दिया अनोखे ने पर जानता था जमील नहीं करेगा ये सब। अनोखे ने बात खत्म की ही थी कि जमील का फोन बजा।

   ‘‘ रौशन की तबीयत बड़ी खराब है। बस तुम आ जाओ किसी तरह। गर्दन एक तरफ लटक गई है और कुछ नहीं खा रहा कई दिन से।’’फोन पर सोनी ने बताया।सोनी के सुबकते हुए शब्दों ने जमील का सारा चैन छीन लिया। रौशन की तबीयत और काम का हर्जा समेत तमाम चिंताएं उसके सर पर सवार हो गईं। बच्चे की तकलीफ सुनकर पहली फुर्सत में जमील गांव रवाना हो गया। अपनी पहचान के एक दूसरे कबाड़ी को काम पर लगा दिया उसने। सोसायटी ने जमील को काम पर रखने से पहले ही बता दिया था एक-दो दिन से ज्यादा की छुट्टी नहीं मिलेगी। गांव जाकर पाया तो वाकई बच्चे की तबीयत काफी खराब थी। पहले जब भी जमील लौटता था रौशन अपनी हंसी से उसका स्वागत किया करता था। छह-सात महीने के रौशन ने बोलना तो शुरू नहीं किया था पर उसके ‘बा बा’ जैसे शब्द जमील को अब्बा सुनाई दिया करते। हाथों में उछाल-उछालकर अपने बेटे से घंटों खेलता था जमील। पर आज उसके आने पर बच्चे में पहचान की एक भी हरकत नहीं दिखी उसे। उसके हंसते-खेलते बच्चे को क्या हो गया? दिल-दिमाग जैसे सुन्न पड़ रहे थे जमील के।

  ‘‘ अरे घबरा मत तू बच्चे दांत निकालते हैं तो ऐसी परेशानी आती ही है। पहली औलाद है न इससे ज्यादा परेशान हो रही है सोनी। वैसे मजार पे जाकर झाड़ा तो मैं लगवा आई हूं।’’ अम्मा चिंतित होते हुए भी उसका हौसला बढ़ा रही थी।
‘‘कल चलेंगे इसे बड़े अस्पताल लेकर।’’गांव के इलाज से कोई खास फायदा न देखकर उसने जल्दी से फैसला लिया।अगले कई दिन अस्पताल में डॉक्टर को दिखाने में बीते। लंबी लाइनों में लगना, टेस्ट के लिए भटकना, दवाइयों के लिए दौड़ना पड़ा उसे। रूपया खर्च हो रहा था पर बच्चा सही होने में नहीं आ रहा था। पता नहीं डॉक्टर ढंग से देख भी रहा है या नहीं। आखिर डॉक्टर ने बताया दिमाग से नीचे आने वाला कोई पानी शरीर में नहीं पहुँच  पा रहा है। कोई नली लगानी पड़ेगी चीरकर तब ठीक होगा बच्चा। घर में ऑपरेशन के नाम पर कोहराम मच गया। अम्मा-अब्बा मानने को तैयार ही नहीं थे कि ऐसी भी कोई बीमारी होती है-
‘‘ठग रहा है डॉक्टर । हमने तो अपने पूरी जिंदगी में ऐसी बीमारी न देखी किसी बच्चे की।’’ अम्मा बोली।
‘‘बेटा दिल्ली ले चल एक बार वहां ही दिखा लेते हैं।’’ अब्बा ने कहा।

दिल्ली के अस्पतालों के जनरल वार्डों  की असलियत जमील जानता था। लंबे इंतजार और मंहगे इलाज। कहने को तो सरकारी हैं पर टेस्ट के पैसे क्या कम हैं वहां? पर बेटे की हालत देखते हुए उसे  दिल्ली जाना ही ठीक लगा। अगले दिन जाने की तैयारी हो गई पर उसी रात रौशन चल बसा। सोनी के साथ जमील भी पगला गया। बच्चे के दुख ने तोड़ दिया उसे। वो सारे सपने, सारी उम्मीदें मिट्टी में लिपटी बेरौनक हो गईं जिस मिट्टी में रौशन खामोश लेटा था। बार-बार खुद से यही सवाल करता-

‘‘मैंने क्या बिगाड़ा था किसीका, जिसकी ये सजा मुझे मिली।’’ पर जवाब नदारद रहता। सारी दिशाएं अजीब से सन्नाटा में डूबी जान पड़तीं और इस सन्नाटे के बीच कभी-कभी लगता रौशन घर के किसी कोने में पहले की तरह हंस-खेल रहा है। जैसे अभी सोनी गोद में ले आएगी उसे और रौशन ‘बा बा’ करता लपकने लगेगा उसकी तरफ। पर उस सन्नाटे को केवल सोनी की सिसकियां और तेजी से उठने वाली चीखें ही तोड़ा करतीं और उसके बाद फिर से एक लंबा सन्नाटा घर भर में छा जाता।
जमील की जिंदगी का गिरता-उठता ग्राफ यों तो पहले भी उसे तोड़ता आया था पर फिर एक नई उम्मीद से खड़े हो उठना उसकी फितरत में था। चोट लगती थी, घायल भी होता था पर मरहम-पट्टी के बाद दुरूस्त और फिर पहले जैसा। पुराने रोग और गम पालने की फुर्सत भी अब कहां थी उसे। जिंदगी को बदलते देखता और खुद भी बदलने की कोशिश करता। पर इस बार संभलना मुश्किल हो रहा था।

‘‘ बेटा तू हिम्मत हारेगा तो सोनी कैसे जिएगी? मरद का काम है हौसला देना,औरत को संभालना। औलाद का दुख तो दोनों को एक जैसा है बेटा पर उसने जनम दिया था रौशन को। उसके दुख की तो सोच। जाने क्या-क्या सोचती होगी।... और ऊपर वाला है न भरोसा कर... जैसे लिया है वैसे दोबारा देगा भी।’’ मां ने इशारों में बता दिया कि बहू उम्मीद से है। उसके शब्दों में जाने कौन-सी मरहम थी कि दर्द हरे होने के बावजूद कम दुख रहे थे। जमील दर्द की तमाम हदों को पार कर फिर खड़ा हो गया।  कुछ दिन सोनी के साथ गुजारे। जिंदगी पूरी तरह नहीं अधूरी ही सही, पुरानी शक्ल में लौटने लगी। इधर जमील की बचाई रकम खर्च हो गयी थी। अब उसे दो-दो मोर्चे संभालने थे-घर और घर के लिए पैसा। उसे शहर आना ही था।
‘‘ नहीं साहब ऐसा कैसे हो सकता है? इतने बरस खिदमत की है आप लोगों की। मुसीबत के मारे को और न मारो साहब।’’ जमील को खुद पर यकीन नहीं था वो लगभग गिड़गिड़ा रहा था अपने काम के लिए।
‘‘देख भाई, तू इतने साल से है न यहां, कभी मांगा तुझसे कुछ? बोल? अब इतना कमाता है कि गांव जाकर ठाठ से रहता है तू । मकान-वकान भी बनाया ही होगा।  साल के बीस हजार ही तो देने हैं बस और कौन सा तुझ अकेले से मांग रहे हैं सबकी एंट्री का चार्ज है और हम कौन-सा अपनी जेब में रखेंगे। सोसायटी के कामों में लगेगा सारा पैसा।’’सोसायटी नए प्रधान ने बड़ी ही सहजता से कहा।
‘‘गरीब आदमी हूं साहब। साल में लाख रूपया कमा सकूंगा तभी तो दे पाऊंगा बीस हजार.. पर इतनी कमाई कहां है मेरी...।’’
‘‘ वो तू जान और फिर ये भी तो देख कितना सुरक्षित है तू यहां... हमारे पास...देख नहीं रहा इतने साल से...हैं जमील?’’ जमील शब्द पर सारा वजन डालते हुए प्रधान ने उसके हिस्से के सच को बयां कर दिया। कमीशन और जमील नाम के आदमी की प्रोटेक्शन मनी दोनों ही मुद्दे नए प्रधान की लिस्ट में थे। 

यहां आने पर जमील ने सारा माहौल बदला पाया। सोसायटी में काम करने आने वालों के लिए एंट्री फीस का नया फरमान जारी होने वाला था। कई दिन सब पर तलवार लटकती रही। जमील का मन किया भाग जाए किसी ऐसी जगह जहां कोई दिक्कत न हो परेशानी न हो पर जानता था कि ऐसी जगह न कहीं थी, न होगी। सोसायटी के कुछ लोगों के दखल और सदाशयता से कई दिन बाद समस्या हल हुई। एक बीच का रास्ता निकाला गया कि सोसायटी को पैसा देने में असमर्थ लेबर को अब हफ्ते में कुछ घंटे यहां के काम-धाम करने होंगे बिना किसी आना-कानी के।
‘‘ देख लिया सब। करो अब जमींदार की बेगारी। इधर से न सही तो उधर से कान तो उमेठ ही लिया न।...और जमील तुझे बचाने कौन साला आएगा बताए जरा? याद नहीं है कैसे निकला था तू पुराने मोहल्ले से। किसी एक ने भी किया था तेरी नेकी का बखान? बड़े आए पैसा मांगने वाले।’’ अनोखे चुप न रहा।

बेटे के दुख और एक नया आसमान टूटने के बाद बहुत बड़ी राहत महसूस करके जमील ने कहा-‘‘ उसमें क्या है अनोखे, जहां एक घंटे बाद आते थे तो एक घंटा पहले आ जाएंगे। तू न घबरा...सोच कहां से लाते इतना रूपया और फिर निकाले जाकर कहां काम ढूंढते?’’
 बंधी-बंधाई नौकरी न होते हुए भी माली, कबाड़ी, गाड़ी धोने वाले, बिजली मरम्मत वाले और मिस्त्रियों के लिए ये सोसायटी ही कमाई का आधार थी। जैसे-तैसे सबने नयी स्थिति को स्वीकार कर लिया। काम की मारा-मारी के इन भयंकर दिनों में अधिकांश को इसमें किसी जुल्म की कोई गंध नहीं आई। मेहनत के कुछ घंटे और बढ़ गए थे पर पगार उतनी ही रही सबकी। दिन बीतने पर अनोखे जैसे कामगारों की ये खलिश भी दूर हो गई। गौ-ग्रास के रिक्शे से नियत समय पर तेज आवाज में रोज का गीत आज भी चल रहा था-‘‘हे धरती मां हे गऊ माता..गूंज रहा है मंत्र महान....पूर्ण सफल हो शुभ अभियान... जीवमात्र का हो कल्याण।’’

अब जमील और भी जिम्मेदारी से काम करने लगा । रद्दी के अपने काम से फुर्सत मिलते ही रोजाना उसे किसी न किसी काम से दौड़ना ही पड़ता। कभी किसी ऑफिस के चेक जमा कराने तो कभी किसी के निजी काम से। शाम के समय भी कई बार मुसीबत पेश आ ही जाती जब उसे अपने कबाड़ को ठिकाने लगाना होता। पर जमील चूं नहीं करता। एक जमील ही क्या सभी मुलाजिम इन्हीं हालातों से गुजर रहे थे। कामों का तूफान जब गुजरता तब दो घड़ी की फुर्सत में नन्हें रौशन का चेहरा उसकी आंखों में घूम जाता। सोनी से भी लगभग रोज ही बात होती थी उसकी। उसे मोबाइल खरीदकर दे आया था इसलिए सोनी भी अक्सर बात-चीत कर लेती। उसकी जचगी के दिन भी पूरे होने वाले थे। जमील को चिंता सताती रहती। यों अम्मा पूरी देखभाल कर रही थी पर जमील हर बार उन्हें सोनी का ध्यान रखने, डॉक्टर को दिखाने और ढंग की खुराक जैसे निर्देश देता रहता। सोनी से वादा किया था तो समय से पहले गांव पहुंच गया जमील।

‘‘हां भई हम पे भरोसा कहां था तुझे कि ख्याल रखेंगे तेरी बीवी का? अब संभाल ले तू।’’
बेटे का मजाक उड़ाते हुए अम्मा ने कहा तो जमील, अब्बा के सामने जरा शर्माया पर जबान तक आए उसके शब्द बेसाख्ता निकल पड़े-‘‘अम्मा जीवन भर का साथ है मेरा-इसका, निभाना तो पड़ेगा न।’’
और जमील-सोनी की गोद में फिर एक बच्चा था। स्वस्थ और सुंदर।
‘‘देख सोनी बिल्कुल रौशन पर गयी है न बिटिया?’’
सोनी हैरान रह गई। अक्सर बच्चे की शक्ल देखकर मां-बाप यही देखते हैं कि एक-दूसरे में से किस पर गया है या फिर ननिहाल-ददिहाल में किस के चेहरे-मोहरे से मिलता है पर जमील...वो तो अलग सी ही बात कर रहा था। उसकी खुशी थम नहीं रही थी।
‘‘इसका नाम रौशनी रखेंगे सोनी...रौशन जैसी रौशनी। तू देखना खूब जतन करूंगा इसका मैं। थोड़ी बड़ी हो लेने दे, तुझे और इसे शहर ले जाऊंगा। वहीं पढ़ाउंगा, किसी अच्छे सकूल में। मदरसे नहीं भेजूंगा शमशेर खालू की तरह।’’

‘‘जाओ रहने दो पूरे खानदान में कोई लड़की बड़े शहर के अच्छे सकूल में गई भी है कभी?’’ इठलाते हुए सोनी ताना जरूर मारती पर भीतर से जानती थी कि जमील बात का पक्का है। फिर अपने छोटे से घर की कल्पना उसके मन में नई चंचलता भर रही थी। बिटिया को छोड़ आए जमील का मन गांव में ही अटका रह गया। जब भी मौका पाता अनोखे को या कमरे में लौटने पर प्रकाश और सुनील को उसके छवि का बखान करके सुनाता।

‘‘अबे पगला गया है। हम भी बाप बने हैं कि तू  निराला बना है?’’
सब उसे छेड़ते पर उस छेड़ में जमील को और आनंद आता।
जमुनापुरी की उस बस्ती में  जमील ने ठीक-ठाक कमरा देखना भी शुरू कर दिया था। यों बस्ती कच्ची थी और गंदी भी पर काम के नजदीक तो थी। साइकिल से आने-जाने में ज्यादा समय नहीं लगता था उसे। आगे की योजना सोचकर अपने काम को भी उसने बढ़ा लिया। पुराना घरेलू सामान भी अब वह खरीदने और बेचने लगा। धंधे के कुछ लोगों से सही जान-पहचान हो गई थी तो उसकी हिम्मत बढ़ गई। 
पुराना फर्नीचर,कम्प्यूटर, टी.वी.,टेपरीकाॅर्डर वगैरहा बिजली का सामान सब लेने लगा कबाड़ में। यों घरों को समयानुसार नया बनवाने वाले लोग पुरानी चैखटें, ग्रिल, घुन खाए या पानी में फूल गए दरवाजे, जाली की बेकार हो चुकी खिड़कियां आदि बिकवाने के लिए उसे ही बुलाते। लोग पुराने हर सामान से उकताकर नए सामान की ओर दौड़ रहे थे। अब भारी और टिकाऊ का नहीं हल्का और टीम-टाम के फर्नीचर का चलन था। पुराना टिकाऊ सामान जिसे करीबी रिश्तेदार भी लेना नहीं चाहते थे जमील उस समस्या का जल्द समाधान कर डालता। इससे उसकी साख भी बन रही थी और पैसा भी। अखबार, लोहा-लक्कड़ और प्लास्टिक अब भी वह खरीदता था पर अब समय के अनुसार अपने को बदलकर धंधे का विस्तार उसने कर लिया था और खुश था। जब भी घर जाता रौशनी के लिए अच्छे-अच्छे खिलौने और कपड़ों की खरीदारी करके ही जाता। अम्मा-अब्बा भी खुश थे।

  इस बार गांव से आया तो उसका पक्का इरादा था अब कोई कमरा ठीक करके सोनी और रौशनी को यहां ले आएगा। बच्ची की नींव सही पड़ गई तो ही अच्छी रहेगी जीवन भर उसने सोचा। और फिर कमरा अनोखे और प्रकाश के बगल में ही लेगा। हारी-बीमारी के साथी तो ये ही थे उसके शहर में। सब सोचते हुए दोस्तों से जरूर सारी बातें साझा करता था जमील। अनोखे के साथ तो आना-जाना और काम की समान जगह होने के कारण चैबीस घंटे का साथ था ही उसका।
‘‘इस बार तू चलना अनोखे ईद पे मेरे संग गांव। कसम से यार घर में घुसते बस नाम बता दियो अपना फिर देखना कैसी खातिर होगी तेरी। सब जानते हैं तुझे।’’ जमील बोला।
‘‘ तो तूने सब बक दई है वहां।’’ ठेठ अंदाज में अनोखे ने कहा।
दोनों ने तेज ठहाका लगाया । अगले ही पल अनोखे बोला-‘‘ कहां फुर्सत होगी मुझे दीवाली पर। सौ काम होते हैं । साल भर का त्यौहार थका मारता है। घर पहुंचते ही सारे घर की पुताई में लग जाता हूं। बैठने नहीं देती तेरी भाभी जरा सी देर को। फिर काम पर नहीं लौटना है कैसे आंउगा तू ही बता?’’
‘‘ अरे बरेली से खतौली जरा सी दूर है। तू मेरे घर ईद मनाकर अपने यहां दीवाली मना लेना या लौटती बार घर आ जाना दोनों संग लौट लेंगे।’’
थोड़ी आना-कानी के बाद अनोखे मान गया। जमील ने सोचा संग ही सोनी और बेटी को भी लेता आऊंगा एक साथी होगा तो बड़ी सुविधा रहेगी।

 सुबह काम पर जाते समय दोनों ने देखा रास्ते में बड़ी चहलपहल थी। पास जाने पर मालूम हुआ यहां माता की चैकी बिठाई जा रही है। कई उत्साही नौजवान माथे पर सुनहरी गोट की लाल चुन्नी बांधे टेंट वाले से काम करवाते हुए भागदौड़ में लगे थे। उनकी आवाजें खूब खुली हुईं थीं। पटरी और सड़क पर भी चैकी का सामान बिखरा पड़ा देखा उन्होंने। मुख्य सड़क से करीब होने के कारण ट्रैफिक वहां से तिरछा होकर गुजरने लगा। सबको खासी दिक्कत हो रही थी। पर धरम का काम था तो सबको असुविधा भी मंजूर। फिर लड़कों के हट्टे-कट्टे शरीर और गरजती आवाज ने किसी को शिकायत करने की कोई छूट भी नहीं दी थी।

शाम तक दोनों अपने उसी पुराने रास्ते से लौटे तब तक माता का भवन पूरा सजकर तैयार था। चार मेजों को जोड़कर माता का भवन सजाया गया था। बड़ी-सी, भड़कीले रंग वाली प्रतिमा के सामने माता का शेर भी विराजमान था। स्टीरियो पर तेज आवाज में भेंटे और भजन चल रहे थे। फिल्मी गीतों की चालू धुनों पर कुछ लड़के-बच्चे नाच रहे थे। उनका नाच भी फिल्मी ही था, जैसे वो बोल पर नहीं धुन पर ही थिरक रहे हों। अनोखे और जमील ने मां के अस्थाई मंदिर के आगे शीश नवाया पर साइकिल का हैंडिल नहीं छोड़ा। दिन भर के थके होने के बाद अभी खाना भी बनाना था और फिर अगले दिन काम पर जाने के लिए सोना जरूरी था उनका। वैसे भी चैकी, जागरण तो अब आए दिन की बात हो गई है। ‘रोज-रोज अगर इनमें जाने लगें तो काम क्या खाक करेंगे’- अनोखे नास्तिक नहीं था पर इस मामले में एकदम साफ था। चौकी  से कमरा पास होने के बावजूद जमील के तीनों संगियों में से कोई भी वहां नहीं गया।

 अगले दिन काम पर जाते हुए दोनों ने देखा चौकी  आज भी कल की तरह ही सजी है। हां झांकियां शायद और सजा दी गईं हैं। आज भीड़ कल से अधिक थी और स्टीरियो भी सप्तम सुर में बज रहा था। साथ में एक टेबल और लगा दी गई थी। नए देवताओं के रूप में गणेश, शिवजी के साथ विराजमान थे। दाएं-बाएं और सामने की छोटी सी जगह में भक्तों के लिए दरियां भी बिछा दी गई थीं। उन पर रखी चादरों से अंदाजा हो रहा था कि रात को कई लड़के यहीं सोए होंगे।
अब तो दोनों जने आते-जाते रोज ही माता के भवन में कोई न कोई नवीन परिवर्तन देखते। चौकी के भवन पर लगे बिजली के लट्टू खींचकर आगे बनी मस्जिद के करीब तक ले आए गए थे। पहले साधारण सा दिखने वाला भवन अब भव्य हो चला। रात में कई भजन-मंडलियां भी जुट जातीं ऐसा सुनील ने सबको बताया । सुनील तो चैकी की आरती में एक दिन शामिल भी हुआ। बस तभी से पड़ा था सबके पीछे-‘ देख लो रात को एक दिन आरती। इतने करीब में होने का कुछ तो फायदा उठा लो।’

 अनोखे ने सोचा एक दिन सभी चल पड़ेगें साथ, वैसे भी चौकी का प्रोग्राम कुछ दिन आगे खिसक चुका था इसकी सूचना उसे भी मिल गई थी। शनिवार को शुरू हुई चौकी को कल हफ्ता पूरा होने वाला था। सुबह वहां से गुजरते हुए अनोखे और जमील ने देखा कि आज बात कुछ और ही है। आटे-आलू की बोरियां , तेल के कनस्तर, मसाले भी चौकी के घेरे में पड़े हैं। और दो हलवाई बड़े-बड़े पतीलों-कड़ाहों को धोते पीछे की तरफ भट्टी सुलगा रहे हैं।
‘‘ले भाई आज तो भंडारा होगा। दोपहर में पूरी-आलू की सब्जी मिलेगी। हो सकता है हलवा भी।’’ अनोखे ने हंसते हुए कहा।

‘‘तू जा नहीं रहा था न चौकी में, तो लड़कों ने आज तुझे बुलाने का पक्का इंतजाम कर दिया।’’ जमील ने चुटकी ली। दोनों ने तय किया कि आज खाने के समय यहीं आ जाएंगे।
भंडारे के समय पहुंचे तो माहौल में अजीब-सी तनातनी के संकेत मिले। लाइन काफी लंबी थी और लाइन में लगे लोगों से ही पता चला-
‘‘ दिन मे बड़ी पुलिस आई थी मस्जिद के पास। एक दिन की चौकी तय होने के बाद अब हफ्ते से ऊपर इक्कीस दिन की चौकी बिठा दी गई है।’’ किसी ने बताया।
‘‘ इन ठलुओं को कोई काम-धंधा नहीं है क्या? इक्कीस दिन जमे रहेंगे यहां?...हमें तो काम से मिनट भर फुर्सत नहीं  भगवान को हम भी मानते हैं पर हमें फुर्सत नहीं मिलती पूजा-पाठ की। आज भंडारा खाने आए हैं, खाकर निकलेंगे काम पर।’’ अनोखे चुप न रह सका।
‘‘ हम भी तुम जैसे हैं भाई। पर असल बात ये है मस्जिद के ठीक बगल में माता का मंदिर बनाया है। और धीरे-धीरे मस्जिद की तरफ सरकते आ रहे हैं। अरे कहीं और बना लेते। ऐसे में न उनके भजन सुनाई पड़ेगे न इनकी अजान। घाल-मेल से दोनों को परेशानी होगी, दोनों भड़केंगे।’’ कोई बोला।
‘‘ हां, मस्जिद तो पक्की है और कितनी पुरानी भी मंदिर कहीं और बना लेते न।’’ जमील का ये कहना था कि आग लग गई। पास से गुजरते किसी सेवक भक्त के कानों में पड़ते ही धमाका हो गया।
‘‘हमारा खाकर हमें गाली देने वाला तू कौन है बे ?...हम क्यों सरकाए मंदिर? इतनी परेशानी है तो ले जाएं वो अपनी मस्जिद कहीं और। हमारा मंदिर यहीं बनेगा और जितने दिन चाहेंगे रहेगा। इनके बाप की नहीं हमारे बाप की जमीन है। गाड़ दिया है हमने तंबू ,दिखाए कोई उखाड़कर।’’
भक्त ने तैश में गुस्से, नफरत और अपने अधिकार का इज़हार किया। उसके कई संगी भी नज़दीक आ गए। अनोखे ने चुप रहने का इशारा किया जमील को। भला हुआ जो ये लड़के नहीं जानते थे कि जमील का धरम क्या है। जमील का मन रूकने का कतई न था पर अनोखे ने उसे रोके रखा। उधर मस्जिद के पास भी भीड़ जमा हो गई। कई लोग चौकी के शोर-शराबे और बदइंतज़ामी से गुस्साए हुए थे। दोनों तरफ तनातनी थी और बीच में भंडारे की भीड़। दोनों तरफ के लोग। मस्जिद के पास घिरे लोग अपने धर्म पर सीधे प्रहार के कारण तो आहत थे ही उन्हें आज की जुम्मे की नमाज़ की फिक्र भी थी। यहां भी नमाज के लिए भीड़ जुटनी शुरू हो रही थी। भंडारे की भीड़ से उन्हें नमाज़ अदा करने की जगह निकालने में मुश्किल आने लगी। बरसों से कभी ऐसा न हुआ था कि जुम्मे की नमाज़ में जगह कम पड़ी हो। पर लग रहा था आज ऐसा होगा। जमील ने सोचा आज खाने के बाद वो भी नमाज़ अदा कर लेगा पर माहौल की नब्ज़ तेज होती जा रही थी।

    मस्जिद की तरफ से आए गुस्साए लोगों ने भंडारा जल्दी निबटाने की बात कही तो हवा में जहर फैल गया। बात भद्दी गालियों से होती हुई सीधे तौर पर साम्प्रदायिक रंग ले बैठी। अपने-अपने धरम की पैरवी में जिसके मन में जो आ रहा था वह बके जा रहा था। ‘हमारी मस्जिद पुरानी है... हमारा मंदिर यहीं रहेगा’- जैसे जुमले हवा में तैरने लगे। उत्तेजना के माहौल को भांपकर जमील ने वहां से निकल चलने के लिए अनोखे का हाथ दबाया। पर अनोखे नहीं हिला। थोड़ी देर में आग ठंडी पड़ी पर उसे सामान्य नहीं कहा जा सकता था। मस्जिद से आई भीड़ अभी वापिस लौटी ही थी कि माता के भवन के पास मांस का लोथड़ा फंेके जाने का शोर मच गया। पर अबकी बार ये शोर यों ही न थमा। चौकी के भ्रष्ट होने के साथ भक्तों का अहंकार आहत हुआ था। न किसी ने लोथड़े को देखा न तफ्तीश की और सैलाब मस्जिद की ओर बढ़ चला। इससे पहले कि लोग कुछ समझ पाते या सुरक्षित स्थान पर पहुंचते पत्थरबाजी शुरू हो गई। मामूली पत्थर नहीं भारी-भरकम ईंटें । भंडारे की जगह लगी भीड़ में भगदड़ मच गई। कई बच्चे, आदमी और औरतें रौंदे चले जा रहे थे। लोग बेतहाशा भाग रहे थे...लोग बेमकसद मर रहे थे। धरम के नाम पर सब जायज था जैसे।
पत्थरबाज़ी जारी थी। भीड़ अंधी हो चली थी, मंदिर-मस्जिद भी दिख नहीं रहे थे बस भीड़ के दो चेहरे थे जो एक-दूसरे को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे। पहले मारकर कौन जीतता है इसीकी सारी लड़ाई थी। दल-बल समेत पुलिस भी आ गई तब तक। माता अब भी संहार देखकर प्रसन्न मुद्रा में थीं। स्पीकर कहीं टूटा पड़ा था। मस्जिद के आगे क्रोशिए की टोपियां छितरी थीं, वजू के लिए पानी के जग दबी-दुचकी हालत में जहां-तहां पड़े थे।  और कई शरीर कभी न उठ पाने की हालत र्में इंटों की गिरफ्त में थे। सड़क का सारा ट्रैफिक भयभीत दर्शकों की तरह सिमटा और सन्न था। सड़क के दूसरी तरफ भीड़ से बचकर भागे लोगों का जमावड़ा तमाशबीनों के साथ खड़ा था। सब अपनी जान बचने का शुक्र मना रहे थे और कई अपनों को ढूंढ पाने में असमर्थ होकर भय से चीख रहे थे। सड़क लहूलुहान थी। पत्तलें, पूरियां, सड़क पर धूल फांक रही थीं। सड़क पर पलट गए सब्जी के पतीलों से बही सब्जी खून की रंगत में तर थी। कितने ही लोग घायल, बेहोश पड़े थे। कर्फ्यू  लगा दिया गया। पुलिस ने घटनास्थल की छान-बीन की। देर तक जारी इस तहकीकात का सच काफी दिन बाद सामने आया। कुछ बाहरी लोगों ने इस  काम को अंजाम दिया था। जमुनापुरी का यह पहला दंगा था। टीवी चैनलों पर साम्प्रदायिकता की समस्या पर कुछ चर्चा हुई। नेताओं ने शांति बनाए रखने की अपील की। ग्यारह लोग मारे गए थे। मारे गए और घायल लोगों को मुआवजे़ की रकम सरकार से मिलना तय हो गया था। मरे हुए और घायलों की लिस्ट बनाई जा चुकी थी...  मुआवज़ा मृत व्यक्ति तीन लाख रूपये और घायल पचास हज़ार प्रति व्यक्ति।
सोसायटी में उस दिन कपूर साहब के घर सुबह से ही जमील की ज़रूरत आन पड़ी थी। एकदम अर्जेंट काम था। उसके आने के समय का हिसाब लगाकर मिस्टर कपूर ने गार्ड रूम में फोन लगाया-
‘‘  गार्ड , सुनो एक सौ दो नम्बर से बोल रहा हूं, जमील आए तो फौरन भेजना...सबसे पहले मेरे घर। समझे?’’
समझे’ शब्द की सख्ती समझकर गार्ड तुरंत बोला -‘‘सर जी, जमील और अनोखे का कुछ पता नहीं। कई दिनों से गायब हैं दोनों।’’
गौ-ग्रास लेने के लिए आने वाली गाड़ी टाइम से सोसायटी में घुस रही थी। तेज़ संगीत में गीत बज रहा था-‘‘ जय धरती मां... जय गऊ माता.... जय गऊ माता-जय गऊ माता।’’