मंगलवार, 10 सितंबर 2013

नफरत पोसती पीढियां

 बारहवीं कक्षा की एक लड़की क्लास में घुसती है और लड़के कहते हैं" अरे बारह  बज गए  " कई लड़के- लड़कियां जोर से हँसते हैं। पढ़ाने वाला अध्यापक भी ध्यान दिए बिना अपने काम में व्यस्त रहता है। जैसे ये एक मामूली- सी बात है।  या ऐसा तो होता ही है। पर लड़की  साथ पढने वाले अपने साथियों के इस सांप्रदायिक हमले से भौचक्की रह जाती है और उनकी अमानवीय हंसी उसे भीतर तक तोड़ देती है।  अध्यापक का उदासीन रुख पूरी क्लास में उसे एकदम अकेला कर जाता है।  न कहीं  शिकायत कर सकती है न उस पिघले सीसे जैसी हंसी को कानों में जाने से रोक सकती है।जी हाँ उसका नाम अमनप्रीत ,जसविंदर या सिमरन दीप कौर कुछ भी हो सकता है।मुझे आज भी याद है बचपन में पिताजी के सरदार मित्र खुद पर चुटकुले सुनाकर हँसते हंसाते थे पर 84 के दंगों ने इस स्वस्थ हास्य को बाधित कर दिया। दंगों में उन पर हुई ज्यादतियों ने जहाँ एक ओर लोगों को सचेत किया वहां दूसरी ओर एक बड़ा वर्ग इस समुदाय को आतंकवादी की संज्ञा देने लगा। अभी कुछ दिन पहले सोनी चैनल के एक धारावाहिक परवरिश में पड़ोसी सरदार परिवार के शैतान बच्चे को आतंकवादी गया। क्या शैतान और आतंकवादी पर्यायवाची शब्द हैं? और क्या आप अपने शैतान बच्चे को आतंकवादी पुकारेंगे? कतई नहीं। इसकी लिखित शिकायत भी मैंने इन्डियन ब्राडकास्टिंग फाउंडेशन में की थी जिसका अब तक कोई जवाब मुझे नहीं मिला है।पर इस तस्वीर का एक दूसरा पहलू ये भी है बात जब हिन्दू - मुसलमान की हो जाती है तो  उसमें अधिकांश हिन्दू संप्रदाय एक होकर हर मुसलमान को आतंकवादी करार देते हैं। ये कैसी दोहरी नैतिकताएं हैं।  जो अपने लिए न्याय चाहती हैं और दूसरे के साथ अन्याय करती हैं। मेरी एक परिचित जो अपने बच्चे को जूड़ी कहकर पुकारने पर बस चालक की शिकायत दर्ज करती हैं वही मुस्लिम  बच्चों और वर्ग को  अक्सर आतंकवादी का संबोधन दिया करती हैं। सांप्रदायिक हिंसा की ये जड़ें  कितनी गहरी हैं जो जातीय नफरत में तब्दील होकर मनुष्यता से एक दर्जा नीचे गिरने का जोखिम आसानी से उठा लेती हैं।  और धीरे -धीरे ये नफरत  पीढ़ियां रचती चली जाती है इस विद्वेष को पालते -पोसते हुए।

सोमवार, 9 सितंबर 2013

कौन है बेशर्म ?



                               बड़ी बेशर्म है

       वो एक गंभीर, स्वाभिमानी लड़की थी जिसे एक महिला डांट रही थी। बच्चों के पार्क में खेलने से नाराज होकर उन्हें पीटने वाली महिला को लड़की ने अपना बचाव करते हुए और तर्क के सभी हथियार चुक जाने पर दो थप्पड़ कसकर रसीद किए थे। समस्या की जड़ यही थी कि एक लड़की से सरेआम पिटना महिला के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचा रहा  था और वो लड़की बिना किसी अपराध बोध के,उनसे माफी नहीं मांग रही थी।
              नैतिकता के ठेकेदारों ने पुरानी बही निकालकर उत्तेजित महिला के पक्ष में लड़की की ‘बेशर्मी’ पर मोहर लगाना शुरू कर दिया था। मैंने महिला को समझाया बच्चे पार्क में नहीं खेलेंगं तो खेलने कहां जाएंगे और उनकी मामूली सी गेंद अगर लग भी जाए तो बच्चों के साथ कभी बच्चा बनकर देखिए सारे मामले सुलझ जायेंगे। इस हस्तक्षेप ने और लोगों को भी उत्साहित कर दिया और सभी शहरों में सिकुड़ती खेलने की जगहों का रोना रोते हुए कब बच्चों के पक्ष में खड़े हो गए पता ही नहीं चला। महिला कुछ शांत होकर एकालाप से संवाद की स्थिति में आ गयी थीं लेकिन लड़की का ख्याल उन्हें अशांत कर रहा था। मुझे लगा हमारे सामाजिक-मानसिक गठन के नजरिए से यह घटना ‘अप्रत्याशित’ और ‘अस्वाभाविक’ थी। ‘अप्रत्याशित’ इसलिए कि छोटे ने बड़े पर हाथ उठाया था और ‘अस्वाभाविक’ इसलिए कि वह हाथ लड़की का था। भारत जैसे समाज में लड़कियों को आमतौर पर यही सिखाया जाता है कि जहां तक संभव हो चुप रहो। अन्याय का विरोध् केवल अपनी सहनशीलता से करो विवेक से नहीं । शायद उस लड़की को अपने परिवार से यह सीख नहीं मिली थी। महिला को पीटने से पहले लड़की ने जब उन्हें पूरी इज्जत देते हुए तार्किक ढंग से बच्चों का पक्ष लिया था तब महिला ने उसे भी तमाचे जड़े थे। बच्चों के सम्मान से अनजान,महिला द्वारा खींचे जा रहे झगड़े का कोई अंत न होते देख मैंने कहा अगर ये बेशर्मी है तो स्वागतयोग्य है। मुझे लग रहा था कि यह गली-मुहल्ले में घटने वाली सामान्य घटना है तभी खबर आयी कि शराब पीकर आए एक दूल्हे को दुल्हन ने बारात समेत लौटा दिया। इस घटना ने पुरानी घटना को मेरे लिए फिर से जीवित कर दिया क्योंकि दोनों के जुड़ाव सूत्रा कह रहे थे कि कहीं यह बनती हुई स्त्री -शक्ति और बदलते हुए समाज का एक रूप तो नहीं? चुप रहना, अन्याय को सहना, अन्याय में भागीदार होना है--शायद किसी विचारक ने ऐसा ही कहा है।