रविवार, 14 दिसंबर 2014

जनसत्ता साहित्य वार्षिकी अक्टूबर २०१४ में प्रकाशित मेरी नयी कहानी रेत की दीवार




                                   
                                      रेत की दीवार

                                                                                                   प्रज्ञा 

‘‘ देखिए हमने आपसे पहले ही कहा था एक अच्छा ड्राइवर साथ में दीजिए। पर आपने न जाने किसे भेज दिया? लोकल साइटसीइंग के लिए तय चार घंटे का सफर उसने केवल दो घंटे में ही पूरा कर दिया ।’’
‘‘पर सब दिखाया न आपको?’’
‘‘दिखाया? ... एक टूरिस्ट प्वांइट और एक मंदिर दिखाने के बाद ही कहने लगा, यहां कुछ ज़्यादा नहीं है देखने के लिए । आने से पहले नेट पर उपलब्ध सारी जानकारी लेकर आए थे हम। उन जगहों का नाम लेते ही उसने कहा -‘‘फलां जगह देखने लायक नहीं है, वो जगह बंद है, वहां आज लगे मेले के कारण जा नहीं सकते।’’ हमने कहा चलो मेला ही घुमा दो तो जनाब ने नखरीली आवाज में कहा-‘‘वहां तक गाड़ी पहुंचना मुश्किल है आप खुद ही चले जाओ।’’ अब आप बताइये मेरे साथ दो बच्चे और मेरे बुजुर्ग माता-पिता और सबको मुझे ही देखना था, ऐसे में इस तरह का इंसान? और फिर इस उम्र में पहाड़ी रास्ते का सफर मेरे परेंट्स क्या पैदल तय कर सकते है? ’’
‘‘ सॉरी मैडम, उसका स्वभाव ज़रा टेढ़ा ही है। और लोगों से भी उसकी यही शिकायतें आती हैं पर क्या करें आज हमारी सारी गाडि़यां  लग चुकी थीं कोई और नहीं था इसीलिए उसे भेजा। कल से आपको अच्छा आदमी साथ देंगे।’’
यात्रा के पहले ही दिन माता-पिता को परेशान और बच्चों को असंतुष्ट देखकर नयना का मन उदास हो गया। विवेक ने कहा था ‘‘तीन दिन रूक जाओ बस। एक ज़रूरी काम के बाद साथ चलेंगे सब।’’ पर उसे तो जुनून सवार था कि अपने दम पर भी ले जा सकती है वह सबको हिमाचल। अनजान जगह पर लोगों से निभाना तो उसे आता था पर बद्तमीज़ी बर्दाश्त नहीं होती थी और बदत्तमीजी़ का मुंहतोड़ जवाब भी दे सकती थी पर यही सोचकर शांत हो गई कि हिम्मत जगाकर जिन माता-पिता को साथ लाई है उनका मन खिन्न होगा। सीधे-सरल स्वभाव के लोग हैं, लड़ाई-झगड़ों से कोसों दूर। रिसेप्शन पर बात होने के बाद भी नयना का मन अशांत बना रहा। पता नहीं कैसा होगा ये नया ड्राइवर ? अरे ये सारे एक ही थैली के चट्टे-बट्टे होते हैं। मन के अशांत भाव को उसने जाहिर न करते हुए अपने चुलबुले अंदाज़ में पापा से कहा-‘‘फिकर नॉट पापा। कल से कोई दिक्कत नहीं आएगी।’’ फिर तीन दिन बाद विवेक के आने के ध्यान ने धीरे-धीरे संशय पर उम्मीद की जीत को कायम कर दिया। बच्चे लॉन  में बैडमिंटन खेलने लगे और वो तीनों बैंच पर बैठकर सामने फैले पेड़ों से लदे हरियाले पहाड़ों का लुत्फ उठाने लगे।  थोड़ी ही देर में नयना अतीत के दरवाजे में दाखिल होकर उन यात्राओं को जीने लगी जो पापा ने कराई थीं। वे या़त्राएं जिनमें कोई परेशानी उसे छू नहीं सकती थी। पापा हैं न--सबसे लोहा लेने के लिए और मां सभी जिद्दें पूरी करने को। पर इस बार-कहां जाना है? कहां रहना है? कहां घूमना है? इंतज़ामात से जुडे़ तमाम सवाल नयना ने खुद ही हल किए थे। उसे लग रहा था आज मां-पापा की वही भूमिका उसे निभानी है। स्मृति की कई छवियों ने न जाने कहां से उसमें असीम साहस भर दिया।
 अगली सुबह पल्लवी और पराग को नयना ने पहले ही तैयार कर दिया और मम्मी से रात को ही कह दिया था कि पापा की वॉक  के बाद और नाश्ते से पहले आप लोग अपनी दो चाय टाइम से पी लेना। ये उनकी बरसों पुरानी आदत है जिसके बिना उनका दिन अधूरा रहता है। नाश्ता करने के बाद सब आज के दिन की यात्रा के लिए तैयार हो गए। मां को उसने समझा दिया था कि वे बेतकल्लुफ होकर नए ड्राइवर के घर-परिवार के बारे में न पूछें। इससे उसे मां की सादगी महसूस हो जाएगी फिर दिखाने लगेगा अपने तेवर। जरा सा हंसकर बोल लो इनसे, सर पर सवार हो जाते हैं। जो अकड़ से रहता है उससे ही ठीक रहते हैं। नयना ने तय कर लिया था कि वो ड्राइवर के साथ वाली सीट पर ही बैठेगी। न जाने मन में कहां से ये बात उसके मन में घर कर गई थी कि साथ बैठकर अपने सख्त रवैये से एक नैतिक दबाव ड्राइवर पर बना सकती है, जिससे वो अपने व्यवहार को सही रखेगा। बलदेव नाम के उस नए ड्राइवर को उसने साफ कह दिया  ‘‘कल का अनुभव बहुत ही बुरा था हमारा और आज की यात्रा में हम वो सब दोहराना नहीं चाहेंगें। ’’
 सबके आने पर बलदेव ने आदतन घर के बुजुर्ग और पुरूष , पापा को अपनी बगल में बिठाने के लिए आगे की सीट का दरवाजा खोला। उसके चेहरे पर नयना ने हल्की- सी हिचक महसूस की जब वो उसकी बगल में बैठने लगी। मां-पापा पीछे और बच्चे उनसे पिछली सीट पर बैठकर धमाचैकड़ी मचाने लगे । सफर के शुरू होते ही नयना ने कुछ बातों पर गौर किया। गाड़ी की रफ्तार धीमी थी और हर मोड़ से पहले मुस्तैदी से हॉर्न बज रहा था। ‘‘बाद में सरपट दौड़ाएगा।’’ उसने मन में कहा। आंखों पर चढ़े काले चश्मे की आड़ से उसने  ड्राइवर की वेशभूषा और चेहरे पर गौर किया। साधारण पर साफ कुर्ते- पायजामे में था बलदेव, पैरों  में कोई स्पोट्र्स शूज़ नहीं सस्ते लैदर की चप्पलें ही थीं। हिमाचली नैन-नक्श, दुबला पतला शरीर। कहीं कोई अतिरिक्त चर्बी नहीं। गोरे रंग पर फबती काली मूंछों की बनावट में फिलहाल कोई ऐंठ नहीं दिख रही थी। बालों में ढंग से तेल लगा था और तिरछी मांग में कोई आवारा जु़ल्फ उसे दिखाई नहीं दी। पर तभी उसके मन ने सवाल किया- बालों के ठीक बने होने से ही तो आवारागर्द न होना सिद्ध नहीं होता न? नयना पक्के जासूसों की तरह कार्यवाही कर रही थी। दूसरी तरफ ये भी सोच रही थी कि बाद में विवेक को ये सब बताते हुए दोनों  कितना हंसेगें । उसने महसूस किया गाड़ी में चल रहे रेडियो की आवाज भी बलदेव के पहनावे से मेल खाती दिख रही थी। उपस्थित होते हुए भी शांत, लगभग अनुपस्थित जैसी। ‘‘ अरे सीधेपन का नाटक है। अभी करेगा चिकचिक, कभी घुमाने को लेकर, कभी देरी को लेकर, कभी पैसों को लेकर।’’ नयना की मुद्रा ये सब सोचकर और कड़ी हो गई। एक और बात उसके ज़ेहन में आई ’’घुमावदार मोड़ आने के बावजूद अभी तो अपने शरीर और गाड़ी पर पूरा नियंत्रण रख रहा है पर हो सकता है कि आगे लिबर्टी लेने लगे। औरत साथ बैठी है यही सोचकर खुश हो रहा होगा। इनके लिए क्या पढ़ी-लिखी, क्या अनपढ़, सब बराबर।’’ अब अगला पहलू था उसकी गाड़ी।  बुलेरो नयना की पसंद नहीं पर गाड़ी पुरानी होने के बावजूद बुनियादी सुविधाओं के साथ ठीक लग रही थी। उसके अपने सामान के रूप में नयना को एक हॉकी  स्टिक नज़र आई और एक पुरानी बोतल में पीने का पानी। स्टिक को लेकर भी बुरे विचार मन में आ रहे थे -‘‘कहीं किसी सुनसान- सी जगह पर इसने हमला कर दिया तो क्या होगा?’’ नयना को दिल्ली एयरपोर्ट की वह घटना भूली नहीं थी कि एक विदेशी महिला को गाड़ी वाले ने लूट लिया था। और वैसे भी बड़े शहरों में ये आए दिन की घटनाएं हो गईं हैं। इसीलिए वह अतिरिक्त सावधानी बरत रही थी।
            अब समय आया उस पर एक नैतिक दबाव बनाने का, सो नयना ने गंभीरता से उसके काम के बारे में बड़ी ही सधी आवाज में पूछना शुरू किया- कि वो कबसे गाड़ी चला रहा है? टूरिस्ट यहां कौन-सी जगह ज़्यादा पसंद करते हैं? जवाब देते हुए जैसे ही बलदेव ज्यादा तफसील में जाने की कोशिश करता वैसे ही वो अपनी तनी मुद्रा और मौन से उसे सचेत कर देती। नयना की हालत बड़ी ही अजीब थी। भीतर का डर, चिंताएं उसे परेशान कर रही थीं और चेहरे से उसे बेहद आत्मविश्वासी दिखना था। जल्दी ही सब कला-संग्रहालय पहुंच गए।
‘‘मैडम मेरा फोन नम्बर ले लो। जब आप, आ जाओ तो मुझे कॉल  कर देना। और एक मिस्ड कॉल  भी मार देना ताकि मेरे पास भी नम्बर हो जाए।’’
‘‘क्यों तुम कहां जा रहे हो? क्या रुकोगे नहीं यहां? आज सारे दिन साथ हो तो क्या ज़रूरत है नम्बर की?’’
‘‘ नहीं जी यहीं हूं बस जान-पहचान वाले मिल जाते हैं तो जरा चाय-वाय...’’
‘‘अभी पी लो चाय और गाड़ी के पास ही ठहरो।’’ आदेशात्मक स्वर में उसकी आवाज निकली। मन ने फिर चेताया ‘‘मत दे नम्बर कहीं बाद में गलत इस्तेमाल करे।’’
इत्मीनान से संग्रहालय देखकर लौटे  तो बलदेव मुंह पर रूमाल डालकर सो रहा था। पापा बोले ‘‘ काम के चक्कर में सोने को कहां मिलता होगा बेचारों को!’’
‘‘  पापा इतना भी बेचारा नहीं है। देखिए क्या ठाठ हैं।’’ नयना की आवाज बेहद खुश्क होती जा रही थी।
बलदेव के गाड़ी स्टार्ट करते ही उसने सवाल दाग दिया-‘‘ नींद पूरी हो गयी है न तुम्हारी? उनींदे गाड़ी चलाना खतरनाक है। जाओ मुंह पर पानी के छींटे मार आओ।’’
‘‘नहीं मैडम जी कोई जरूरत नहीं। अपना खाना-सोना तो ऐसे ही रहता है। ’’ मेरे चुप रहने पर वह फिर बोला-‘‘आप लोग पहले घूमोगो या कुछ खाओगे?’’ हमारे जवाब का इंतज़ार किए बिना ही उसने कहा-‘‘रास्ते में अच्छा ढाबा है वहीं खा लो आप।’’ नयना का मन तुरंत बोला ‘हां अच्छा ढाबा ...यानि अच्छा कमीशन। और ऊपर से उम्मीद रखेगा कि इसे भी खिला दें।’’ उसने पापा को पलटकर देखा। पापा ने बात समझकर, मुस्कुराकर  टाल दी। मन फिर बोला‘‘ भई जब तुम्हारे पूरे पैसे दे रहे हैं तो क्या अपने खाने पर थोड़ा भी खर्च नहीं कर सकते ?’’ एक ठीक-ठाक सी जगह पर उसने गाड़ी रोकी। मां ने आदतन पूछ ही लिया-‘‘तुम भी कुछ मंगा लो बलदेव।’’ नयना सवाल से भरी आंखों से मां को घूर ही रही थी कि वो बोला-‘‘ जी अपना खाना तो बस दो टाइम का है। खाकर चला और जाकर खांऊगा। पानी साथ रखता हूं। आप इत्मीनान से खाकर आओ।’’ उसकी इस विनम्रता का नयना पर कोई खास असर नहीं पड़ा क्योंकि उसका मानना था-‘‘ हमारे खाने से कमीशन के रूप में उसकी अतिरिक्त आय होने ही वाली है तो खाए न खाए हमें क्या फर्क पड़ना?’’
‘‘खाना तो अच्छी जगह खिलाया उसने, क्यों?’’ पापा ने पूछा।
‘‘वो तो मैं सख्ती दिखा रही हूं न इसीलिए लाइन पर है। वर्ना आपको पता नहीं क्या, कितनी मंहगी जगह ले जाते हैं ये लोग दो कौड़ी का खाना खिलाने।’’ नयना ने खुद पर गर्व किया। मां ने फरियादी स्वर में कहा ‘‘ उसके लिए भी ले ले न कुछ। थोड़ा मीठा ही सही। खुश हो जाएगा।’’
‘‘ नहीं मां...एकदम नहीं, और हम क्यों करें  खुश उसे? सख्त बने रहना ही ठीक है।’’ इस बार पापा बोले ‘‘ इस सख्ती के चक्कर में तू लगातार टेंशन लेकर नहीं चल रही है?’’ सवाल ठीक था पर इससे बड़ी टेंशन जो नयना को थी उसका क्या? दो बुजुर्ग और दो बच्चों की जिम्मेदारी, अनजान जगह और वो अकेली जवान औरत। जरा सी नरम पड़ी कि मामला हाथ से निकल जाएगा। वाइल्ड लाइफ सेंचुरी में गाड़ी पार्किंग के किराए के साथ, जीप और टिकिट का खर्चा भी था। लाइन लंबी देखकर पापा ने हजार का नोट उसे थमाकर टिकिट लाने भेजा। टिकिट हाथ में पकड़ाकर भी शेष बचे हुए पैसे जब बलदेव ने न लौटाए तो नयना की आंखों ने पापा से सवाल किया। ‘‘ले लेंगे’- वाले बेफिक्र अंदाज में  पापा सबको लेकर आगे बढ़ गए। कुछ देर चलने पर नयना को एहसास हुआ कि पापा के हाथ में सौंपा कैमरा गायब है। अच्छी तरह याद था नयना को, जीप तक तो उनके ही हाथ में था। मंहगा और विवेक का पसंदीदा कैमरा होने की वजह से उसकी जान सूख गई। पापा से कुछ न कहने में ही समझदारी थी। खामखां परेशान होंगे। पराग का मिनी कैमरा और नयना का मोबाइल कैमरा होने के कारण पापा को कैमरे की कमी महसूस नहीं हुई। घूमकर लौटे तो बलदेव ने साथ बैठते ही ड्राअर से कैमरा निकालते हुए कहा ‘‘ जीप वाले के बैंच पर सर से गलती से छूट गया था शायद। ’’ उसकी इस ईमानदार-जिम्मेदार हरकत पर अचानक ही विश्वास न कर पाने के कारण नयना के मुंह से उसके लिए शुक्रिया का एक शब्द नहीं निकला पर कैमरा मिलने पर एक अदृश्य शक्ति के लिए दो बोल जरूर निकले-‘‘थैंक गॉड ।’’ 
 वाइल्ड लाइफ सेंचुरी से निराश होकर अब उन्होंने चिडि़याघर की ओर रूख किया। शाम घिर रही थी और बच्चों को भूख भी लग रही थी और सबका चाय पीना एकदम जरूरी हो रहा था। खाने-पीने के एक खोखे के पास सब रूक गए। बलदेव मां से बोला ‘‘मैडम घर में पेड़ है खुबानी का। कल आपके लिए लेता आऊंगा। बच्चे ज्यादा खाकर अपना गला खराब कर लेंगें।’’ मां उसे लगभग आशीर्वाद देती हुई मुस्कुरा रही थीं पर नयना का मन कह रहा था- ‘‘न जाने कैसी कच्ची-सी ले आएगा? और क्या हमारे गले खराब नहीं होंगे? जितने की खुबानी नहीं होगी उससे चैगुने की तो दवा ही आ जाएगी। और फिर बाज़ार से दोगुनी कीमत नहीं वसूलेगा क्या हमसे? नहीं चाहिए तुम्हारी खुबानी।’’ पापा के ‘हां’ कहने के बावजूद नयना ने कोई तवज्जो नहीं दी। लौटते हुए रात घिर रही थी।  थके होने के कारण मां-पापा उनींदे हो रहे थे और बच्चे तो दिन भर की धमाचैकड़ी से निढाल होकर बेखबर सो गए। पर नयना को तो जागना ही था। सबकी निगरानी, फिर ड्राइवर के साथ वाली सीट पर सोने से उसके उनींदे होने का खतरा भी था और तीसरे उसे लग रहा था कि सोने पर कहीं कोई ऊटपटांग हरकत न हो जाए उसके साथ। अचानक बलदेव ने कहा-‘‘ जी एक रास्ता और है जिससे दस किलोमीटर का फर्क आता है। उसीसे ले चलता हूं।’’ उसके सहज कथन ने तूफान मचा दिया। ‘‘जब छोटा था तो पहले भी इससे क्यों नहीं  लाया? रात में नया रास्ता किसलिए पकड़ा जा रहा है? कहीं हाल ही में दिखाई जा रही सारी भलमनसाहत के पीछे इसकी कोई अपराधी प्रवृत्ति तो नहीं छिपी?’’ महानगरों में ऐसे ही लोगों को उल्लू बनाया जाता है। यहां तो दूर- दूर तक कोई है भी नहीं। नयना को अचानक जैसलमेर के रेगिस्तान सम से होटल तक लौटने का वाकया याद आ गया। बहुत रात घिर चुकी थी उस दिन और मीलों तक अंधेरा और निर्जन था। अचानक ड्राइवर ने कहा-‘‘ रास्ते में मेरा गांव पड़ता है, पांच मिनट रूककर चलूंगा।’’ उसके ये कहते ही नयना ने डरकर विवेक को देखा था।  घबराहट तो विवेक के चेहरे पर भी थी पर उनकी बुद्धि ने काम किया। सावधानी के लिए उन्होंने होटल के मैनेजर को फोन मिलाया और बताया कि हम कहां हैं और कितनी देर में पहुंचेंगें । पर दोनों ही जानते थे कि ऐसा करके वे केवल अपने को तसल्ली दे रहे हैं। यहां किसी ने मार-काटकर डाल दिया, किसी को क्या फर्क पड़ना था। पांच-सात घरों के गांव में जब उसने गाड़ी रोकी तो दोनों दम साधकर बैठ गए। अनिष्ट की सैकड़ों आशंकाएं कौंध गईं। इंसानी फितरत भी अजीब है। अच्छे की संभावना की अपेक्षा उसे बुरे की आशंका ही अधिक रहती है। विवेक ने तो कह ही दिया था ‘‘ तैयार रहो बुरे से बुरे के लिए।’’ पर ड्राइवर बिना चाकू- तलवार लाए एक रूमाल में रोटी और पीतल के कटोरदान में दाल या सब्जी भरकर अपने लिए रात का खाना लेकर लौटा। उस रात होटल सुरक्षित पहुंचने को नयना और विवेक ने एक दैवीय चमत्कार ही माना था। आज उस घटना को याद कर नयना डर के बावजूद थोड़ी राहत भी महसूस कर रही थी।
            आबादी वाला और पहचाना- सा रास्ता आता देखकर नयना की जान में जान आई। ‘‘ सारा सामान कमरों तक पहुंचाकर जब बलदेव जाने को हुआ तो नयना ने कहा ‘‘कल भी घूमना है, तुम आ सकते हो?’’
‘‘जी मैडम, कितने बजे?’’ उसे समय बताकर जब नयना पापा के कमरे में गई तो दोनों बच्चे नाना के पेट पर हाथ रखे और पैरों पर पैर चढ़ाए अपनी बातें कर रहे थे। मां ने कहा-‘‘बड़ा अच्छा दिन रहा आज का।’’  मां-पापा और बच्चों को खुश देखकर उसे अपार संतोष हुआ। अगले दिन की यात्रा पापा के आदेश से शुरू हुई ‘‘चल तू बैठ मां के पास। इतना बूढ़ा भी नहीं हुआ जितना लाड़ लड़ाकर तू बना रही है।’’ एक बार पापा को सचेत रहने का इशारा देकर नयना मां के पास बैठ गई। गाड़ी स्टार्ट करने से पहले ही बलदेव ने कहा ‘‘साहब आपके कल के बचे दो सौ अस्सी रूपये। मैं भूल गया था जी।’’ और एक थैला मां को सौंपते हुए कहा ‘‘जी चखो, मेरे पेड़ की खुबानी।’’ नयना झेंप गई। आज पापा लुत्फ उठाने के पूरे अंदाज़ में थे। ‘‘बलदेव यार! पुराने गाने नहीं हैं तुम्हारे पास ?’’
‘‘साहब आजकल टूरिस्ट फड़कते गाने सुनते हैं। मैं तो रेडियो ही चलाता हूं । अभी लगाता हूं आपके लिए पुराने गाने।’’ बस पापा तो रफी, किशोर और मन्ना डे के गीतों के साथ बलदेव के मुरीद हो गए। कभी खिड़की से बाहर देखकर तो कभी मां-बच्चों को देखकर उनकी शांत मुस्कुराहट उनकी तसल्ली का अफसाना बयां कर रही थी। आज सब नयना के आदेशों से मुक्त थे। ‘‘घर-परिवार में कौन-कौन हैं तुम्हारे?’’ कल से कुलबुलाता मां का सवाल आज खामोश नहीं रहा। एक चुप्पी के बाद बलदेव ने कहा ‘‘  परिवार तो कहां है जी ! मां-पिताजी  नहीं रहे , भाई अलग हो गया है। अब घर के नाम पर बस जी मैं, बीबी और दो बच्चे। और कौन!’’ सभी ने गौर किया इस आदमी के लिए घर का मतलब एकाकी परिवार नहीं ,सबका साथ था और इसीलिए सवाल के जवाब में आई उसकी चुप्पी ने बहुत कुछ कह दिया।
नयना के माथे पर आज तनाव की सिलवटें  लगभग गायब थीं। दो घंटे के बाद सब लोग एक नदी के पास थे। नदी का विस्तार, गति, लहरें और ठंडक सबको अपनी तरफ खींच रही थीं। कई गाडि़यां नदी से काफी ऊपर की ओर रूकी थीं पर बलदेव मां-पापा की सुविधा को देखते हुए गाड़ी को नदी के बिल्कुल पास ले गया। मां को सहारे से उसने नदी किनारे एक बड़े से पत्थर पर बिठा दिया। पापा तो पैंट के पायंचे  मोड़कर पानी का सुख लेने नदी में पहुंच गए। ग्लेशियर से पिघलकर आता बर्फीला पानी जहां पांवों को राहत पहुंचा रहा था वहीं रेत में बने गड्ढों में खौलता पानी था। एक ही जगह पर ऐसी विचित्रता रोमांचित कर रही थी। बलदेव ने ही बताया कि सर्दियों में ऐसे गड्ढे खोदकर लोग उनमें बैठ जाते हैं। उसकी बातों से बच्चों को एक नया खेल मिल गया । दोनों  अपने नन्हें हाथों से रेत को खोदकर गड्ढा बनाने में जुट गए। बलदेव ने उनके पास ही एक नया गड्ढा खोदना शुरू कर एक छोटी- सी प्रतियोगिता की चुनौती देकर बच्चों को उत्साहित कर दिया। जो बच्चे कल से रिवर राफ्टिंग की जिद्द पकड़े थे उन्हें एक बार भी उसका ख्याल नहीं आया। 
            नयना भी अब पूरी तरह बेफिक्री के मूड में आ चुकी थी। उसने महसूस किया कि बलदेव के साथ ने उसके ओढ़े हुए गंभीर व्यवहार की परत को छील-उखाड़कर उसे फिर से अपने मां-पापा का चंचल बच्चा बना दिया है। बहुत देर तक नदी को निहारने, लहरों से खेलने के बाद सूचना आई कि ये क्षेत्र खाली कर दिया जाए क्योंकि नदी में पीछे से पानी छोड़ा गया है। हाल ही में पच्चीस बच्चों के इसी तरह बह जाने की पीड़ादायी घटना से पापा चिंतित हो गए और जल्दी- जल्दी सबको उठाने लगे। ‘‘ निश्चिन्त  रहिए साहब इतनी जल्दी कुछ नहीं होगा।’’ ऐसा कहकर हमें ले चलने से पहले बलदेव ने बच्चों के गड्ढे और अपने गड्ढे के बीच बनी दीवार को एक खेल बनाकर तोड़ना शुरू किया-‘‘देखो मेरा गड्ढा तुम्हारे से बड़ा है पर अगर दोनों मिल जाएं तो हमारा गड्ढा यहां सबसे बड़ा हो जाएगा।’’ तीन जोड़ी हाथों से खोदी जा रही रेतीली दीवार की तरह नयना के मन में बलदेव के प्रति जबरन बनाई गई दीवार सरकते हुए अब पूरी तरह धंस चुकी थी। कहते हैं कि यात्राएं बहुत कुछ सिखाती हैं। नयना ने भी आज जाना- भीड़ भरी इस दुनिया में भी इंसान  मिल ही जाते हैं।  


                                                                                               

बुधवार, 8 अक्टूबर 2014

पक्षधर के नवीन अंक में प्रकाशित मेरी कहानी फ्रेम

कहानी 

                                                                     फ्रेम
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                        
‘‘आज शाम पांच बजे आई. एन. ए.... दिल्ली हाट’’
‘‘ओ.के.’’
‘‘ठीक पांच’’
‘‘ओ.के.’’
रावी और जतिन के बीच दिन भर में न जाने कितने मैसेजेस का आदान-प्रदान होता रहता है। कहने को दोनों एक ही जगह काम करते हैं पर कितने जोड़ी आंखें और कितने जोड़ी कान उन्हीं की तरफ लगे रहते हैं। जैसे ही दोनों के हाथ फोन पर जाते हैं कितने होंठों पर मुस्कुराहट तैरने लगती है। चाहे खट्टी हो या मीठी। एक ही आॅफिस के अलग हिस्सों में बैठे रावी-जतिन जानते हैं कि वो लोगों के मनोरंजन का बेहतरीन साध्न हैं । एक लाइव, मजे़दार टाइम पास। उनके इर्द-गिर्द घूमते लोग पियून से लेकर वाइस प्रिंसीपल तक सभी को इस किस्से में गहरी दिलचस्पी है। ऊपर से खुद को निस्पृह दिखाने वाले भी आंख-कान खुले रखते हैं। और रूमाल से नाक को पांेछपांछ कर उसके सूंघने की क्षमता पर आंच नहीं आने देते। झूठी और गढ़ी हुई कोई भी बात इन दोनों के नाम से खूब चलती है पूरे स्कूल में। नाॅन टीचिंग ही नहीं टीचिंग स्टाफ भी उनके चेहरे पढ़कर कहानियां रचने का एक्सपर्ट हो रहा है। रावी-जतिन दोनों से ये तमाम हरकतें छिपी नहीं हैं। पर सावधानी हटी दुर्घटना घटी की तर्ज पर दोनों अतिरिक्त रूप से सावधन ही रहते हैं। दोनों के लिए हर पल एक आफत की तरह गुजरता है। बैठने-उठने, बोलने-बतियाने में हर तरफ नजरों का कड़ा पहरा उनको साफ दिखाई देता है। जतिन तो बार-बार कहता है-‘‘दो दिल मिल रहे हैं मगर चुपके-चुपके...’’ और  रावी का जवाब हर बार उसे सावधान करते हुए यही होता है-‘‘सबको हो रही है खबर चुपके-चुपके।’’
सप्ताह में दो-तीन बार रावी बहाने बनाकर जतिन से मिलने में कामयाब हो ही जाती है। यों तो रोज़ ही जतिन की आंखों से मिली तारीफ पाने के चक्कर में रावी तैयार होकर आती है पर जिस दिन दोनों के घूमने का प्लान होता है उस दिन तो रावी से नज़र ही नहीं हटती। कपड़े और बालों के अंदाज से ही नहीं उसके बोलने-चालने के अंदाज़ से ही सबको शक हो जाता है कि आज तो कोई खास बात है। जतिन के साथ समय बिताने की कल्पना से ही वह दिन भर अपने में मगन सी रहती है। दिमाग में लगातार एक लिस्ट बनाती रहती है जरूरी बातों की जो आज जतिन से हर हाल में करनी ही हैं। वैसे तो मोबाइल से हर तरह की सहूलियत है पर हाथों में हाथ और आमने-सामने की बात का मजा ही और है। उस दिन तो कोई कुछ पूछे पहली बार में रावी को समझ ही नहीं आता फिर चैंककर कहती है ‘‘क्या कहा दोबारा कहिए’’। लोग कोहनी मारकर आंखों में एक-दूसरे से कहते हैं-‘‘ हां भई दिमाग तो जतिन में लगा रखा है हमारी बातें क्या खाक समझ में आएंगी।’’ जतिन अपने आप को संयत रखने का ढांेग बखूबी निभा लेता है पर रावी अपना पार्ट निभाने में अक्सर चूक जाती है। कहने को जतिन स्कूल का यूडीसी है और रावी उसके मातहत तीन एलडीसी में से एक। इसलिए मिलने -मिलाने के अवसर कम नहीं हैं पर ये मिलना भी कोई मिलना है? स्कूल से ही अगर घूमने का कार्यक्रम बनता है तो दोनों ,लोगों की आंखों में ध्ूल झौंकते हुए रोज़ की तरह अपने अपने रास्तों की ओर निकलते हैं और फिर तय किए प्वांइट पर मिलकर रावी जतिन की बाइक पर सवार हो जाती है। रावी हेलमेट लगाना कभी नहीं भूलती। कई बार जतिन से कहती है--
‘‘या तो गाड़ी खरीद लो नहीं तो एक बुर्का।’’
और जतिन यही जबाब देता-‘‘ गाड़ी तो आ ही जाएगी और कुछ दिन बाद बुर्केवाली घर ही आ जाएगी।’’
नये ज़माने की तमाम हवा लगे होने के बावजूद जतिन के ये शब्द अनोखा- सा रोमांच भर देते रावी के भीतर।
आज भी रावी की लिस्ट हमेशा की तरह तैयार थी। वैसे तो वह जतिन के सामने एक धैर्यवान श्रोता की ही तरह बैठती थी  पर अपनी बात कहने के बाद। आज की लिस्ट के मुताबिक पहला मसला चंदेल चाचाजी और उनकी जासूसी का था। नाक में दम कर रखा था उन्होंने। ‘‘ अरे सगे चाचा थोड़े ही न हैं तुम्हारे जो इतना डरती रहती हो उनसे।’’
‘‘सगे नहीं हैं पर रोब तो पूरा है उनका। पापा इसी स्कूल से जो रिटायर्ड हुए हैं और पिफर मेरी नौकरी लगवाने मेें भी़ ़़ ़ ़
‘‘ उस नाते तो मैं तुम्हारा चाचा हुआ मिस रावी मित्तल। तुम्हारी नौकरी लगवाने में मेरा रोल सबसे ज़्यादा है। तुम्हारे पापा ने इस काम के लिए बड़ी चिरौरी की थी मेरी। उनकी दिली ख्वाहिश थी कि उनके रिटायर होने से पहले तुम यहां आ जाओ। कम पापड़ नहीं बेले हैं मैंने।’’
‘‘हां -हां सब मतलब के लिए तो’’
‘‘ सच रावी जब तक तुम्हें देखा और जाना  नहीं था तुम मेरे लिए मित्तल सर की बेटी ही थीं। एक सहकर्मी होने के नाते ही यहां तुम्हारी अस्थाई नियुक्ति में मेरी और तुम्हारे चाचाजी चंदेल साहब की भूमिका थी। पर क्या तुम नहीं जानतीं कि यहां स्थाई करवाने के लिए मैंने कितनी भागदौड़ की। वो तो भला हो प्रिसींपल सर का जो मेरी बात सुन-समझ लेते हैं नहीं तो इन पब्लिक स्कूलों में नौकरी मिलनी कितनी मुश्किल है?’’
‘‘यही तो मतलब था।’’
‘‘ अब प्यार को मतलब कहोगी तो कैसे चलेगा?’’
‘‘पर चाचाजी को पक्का शक है। अपने जासूस छोड़ रखे हैं उन्होंने। उनको अपने घर देखकर जान सूख जाती है मेरी।’’
‘‘परेशान न हो रावी इतने भी बुरे नहीं हैं। ’’
‘‘ हां बुरी तो मैं हूूं जो यहां तुम्हारे चक्कर में अपना समय गवां रही हूं। तुम कैसे भी इस मुसीबत से मेरा पीछा छुड़वाओ।’’
‘‘कैसे?’’
‘‘ पापा से सब कह दो। देर हो जाएगी तो ़ ़ ़’’
‘‘ ऐसे कैसे देर हो जाएगी? थोड़ा इंतज़ार करो। और तुम भी न यही सबके लिए मिलने आई थीं यहां? चलो कुछ और बात करो।’’
‘‘रहने दो।’’
‘‘अरे कर लूंगा बाबा अब तो कुछ और बात करो न प्लीज़।’’
‘‘ अच्छा जतिन क्या शादी के बाद भी हम यहां ऐसे ही आते रहेंगे? ’’
‘‘ क्यों नहीं? शादी होने से सब कुछ बदल जाएगा क्या?’’
‘‘ हां सब तो यही कहते हैं। प्रेम-विवाह भी बाद में बाकी विवाहों जैसा ही हो जाता है।’’
‘‘क्या मतलब?’’
‘‘ मतलब मैं नौकरी और घर संभालूंगी और तुम बाहर रहोगे।’’
‘‘ रावी शादी के बाद क्या मुझे घर से निकाल देने का इरादा है तुम्हारा? और तुम ही घर क्यों संभालोगी? मेरे घर को मैं भी संभालूंगा। और तुम कभी-कभी अकेले आना यहां शाम बिताने । कभी घूमने -पिफरने अपने दोस्तों के साथ। मैं खाना बनाकर तुम्हारा इंतज़ार करूंगा।’’
‘‘ जाओ-जाओ ये सब कोरी बातों से न फुसलाओ।’’
                रावी-जतिन की शामें ऐसी ही नोंक-झौंक में निकल जाती। जतिन को कई बार लगता कि रावी जैसे एक अबोध बच्चे की तरह है जिसने अपनी मां-दादी-नानी को देखकर जीवन के कुछ निष्कर्ष निकाले हुए हैं और समय के साथ उन्हें बदलना नहीं चाहती। इसीलिए जतिन के घर संभालने और खाना पकाने जैसी बातों पर उसे विश्वास नहीं होता। जतिन गहरे अफसोस से भर उठता था कभी-कभी। कितनी मेहनत की है जतिन ने कि अपने पिता जैसा न बनने के लिए, रावी क्या जाने? आज भी अतीत जतिन की आंखों में जिं़दा है।
‘‘शारदा कितनी बार समझाना पड़ेगा तुझे? एक बार में सुनता नहीं है क्या? कह दिया दाल-सब्जी में मिर्च नहीं डलेगी, इमली नहीं गिरेगी। क्यों डाला है गरम मसालाक्या छौंके बिना दाल गले नहीं उतरेगी? बाल-बच्चे वाली हो गयी पर शौक- मौज नई दुल्हन जैसे। चटोरी कहीं की।’’
जब तक पिताजी जीवित रहे जतिन को समझ ही नहीं आया कि क्यों पिताजी जबरन मां को अपने जैसा सादा खाना खाने पर मजबूर करते रहे सिपर्फ एक तर्क देकर-‘‘सादा खाना खाओ शरीर ठीक रहेगा और चंचलता भी काबू में रहेगी।’’
और मां धीरे-धीरे रंगती गई पिताजी के रंग में, एक बेरंग, बेरौनक रंग में। पिता की कठोर छवि के आगे अपनी फूल- सी इच्छाओं को मसलती मां। बचपन से ही चटपटे खाने की , घूमने-पिफरने, सजने- संवरने और गप्पे मारने की शौकीन मां अपनी जवानी में ही वृद्ध- सी नज़र आती। पिताजी ने बड़ी चतुराई से ढाल लिया था उन्हें। कभी-कभी जतिन को मां पर गुस्सा भी आता। जब भोजन को इतने अरूचिकर ढंग से गटकती मां को देखता। मां फंेक क्यों नहीं देती है ये थाली ? क्यों अपने सारे गुस्से को बेस्वाद दाल की तरह हलक में उंडेल लेती है? पिताजी की चालाकी क्यों नहीं समझती है जो खुद अस्वस्थ रहने के चलते मां को भी अपने जैसा बनाने पर तुले हैं। जीवन भर तमाम इच्छाओं को मारने वाली मां जब विधवा हुई तो रिश्तेदारों से भरे घर में एकांत पाकर जतिन से बोली ‘‘ बेटा कहीं से खिचड़ी मिल जाए खूब मटर वाली, ऊपर से घी और ढेर सारा गरम मसाला डालकर ले आ। बड़ा मन हो रहा है। कबसे कुछ खाया ही नहीं। ’’ उस दिन से ‘कबसे’  शब्द जतिन के मन में अटक गया। उसके बाद जतिन ने खुद से पकाना और मां की पसंद का उसे खिलाना शुरू कर दिया। मां को पकाने से भी अरुचि हो गई थी। कई बार जतिन पूछपाछकर या इंटरनेट और टीवी की मदद से नई चीजें बना देता तो कई बार बाहर से चाट-पकौड़े भी आ जाते।  उसके जीवन की सबसे बड़ी साध ही मां को उसकी पसंद का खिलाना-घुमाना हो गयी।  मां से कहता भी कि ‘‘मां शादी के बाद तेरी बहू जैसा खाना चाहेगी वैसा ही खाएगी। तेरी तरह इच्छाएं नहीं मारेगी।’’ और मां कहती ‘‘कहकर नहीं करके दिखाना तू। और खाने-पीने में ही नहीं घूमने, बोलने-बतियाने, सजने-संवरने सबका ध्यान रखना होगा तुझे।’’ इसीलिए रावी के भोले निष्कर्षों पर जतिन मन में ही हंसकर रह जाता। वह शादी के बाद जि़ंदगी को उसे जि़ंदादिल तोहफे के रूप में देना चाहता था।
                स्कूल में केवल एक संजीव सर ही थे जिन्हें जतिन एक परिपक्व और संवेदनशील इंसान समझता था और कई बार रावी से जुड़ी बातों को उनसे साझा भी किया करता था। क्लासेज़ से कभी-कभार फुर्सत मिलने पर वे जतिन के साथ कुछ समय बिताते। जतिन उन्हें रावी से जुड़ी बातें बताने को तो आमादा रहता ही साथ ही अपनी जिज्ञासाओं के हल और अपनी संशयों को भी बांटता। जल्दी ही उसे रावी के घर भी जाना था तो थोड़ा परेशान भी था। अपनी परेशानी लेकर जतिन एक दिन संजीव सर के सामने हाजि़र हो गया।
‘‘सर, रावी के पिता तो मुझे बहुत अच्छी तरह जानते हैं पर मैंने उन्हें जितना जाना है वे जात-बिरादरी और धर्म के बड़े पक्के हैं। क्या वे मुझे स्वीकारेंगें?’’
‘‘मेरे हिसाब से तो तुम एक बार उनसे मिल लो बाकी निर्णय तो तुम दोनों का ही है। तीस पार की उम्र है रावी की, शादी के बारे में सोच तो रहे ही होंगे। न भी मानेें तो तुम लोग अपना निर्णय जीना। दोनों समझदार हो ,आत्मनिर्भर भी हो।’’
‘‘ पर मुझे लगता है कि रावी के मन को ठेस लगेगी अगर वे नहीं माने तो। उसका सपना है उसके परिवार की सभी शादियों की तरह सब हंसी-खुशी और पूरे तामझाम के साथ हो। देखने से तो समझदार लगती है पर मैं ही जानता हूं कि अभी उसमें कितना बचपना बाकी है। ’’
‘‘और तुम क्या सोचते हो जतिन इस बारे में?’’ संजीव सर ने तार्किक मुद्रा में सवाल किया।
‘‘हंसी-खुशी तो मैं भी चाहता हूं सर पर तामझाम नहीं। मैंने अपनी शादी के बारे में यही सोचा है कि किसी से भी आर्थिक मदद नहीं लूंगा। जो मेरे पास है जैसा है उसीमें अच्छा करने की कोशिश रखूंगा। रावी से भी मुझे कोई मदद नहीं चाहिए। पर वो मेरी बातों पर गौर ही नहीं करती। उसे तो लगता है मां-बाप बेटियों के लिए करते ही हैं सब। अक्सर हम दोनों की इस बात पर तकरार हो जाती है सर। ’’
‘‘सही सोचा है तुमने... और रावी अभी तक इसे सामान्य विवाह की तरह ही ले रही है। हां, पर अब देर करना सही नहीं। एक बार मिल लो मित्तल जी से और तुम दलित-वलित तो हो नहीं जो उनके गले नहीं उतरोगे। मेरी ज़रूरत हो तो बताओ?’’
‘‘ तो आप क्या सस्ते में छूट जाएंगे सर? पर अभी मैं अकेले जांउगा फिर मां और आप चलिएगा। पिताजी हैं नहीं और बड़े भैया को बिना दहेज वाली शादी में कोई इंटरैस्ट होगा नहीं।’’
जतिन ने सोच लिया कि अगले इतवार हिम्मत करके रावी के पिता से साफ-साफ बात कर लेनी है। बीच के कुछ दिन अपने मन को हिम्मत बंधाता रहा। रावी अन्य प्रेमिकाओं की तरह अपने पिता को अच्छी लगने वाली बातें उसे बताने लगी ताकि बात करने में सुविध हो और बात आसानी से बन जाए। इसी बीच स्कूल का एनुअल डे आ गया। एनुअल डे का मतलब सांस्कृतिक कार्यक्रमों से लेकर पूरे स्कूल के भोज तक था। कई दिनों की मेहनत के बाद जब भोजन का समय आया तो सभी लाॅन में इक्ठ्ठे हो गए। इमारत लगभग खाली थी। रावी और जतिन भी भोजन में शामिल होने जाने वाले थे। पर रावी ने सुबह ही जतिन को बता दिया था कि आज उसकी पसंद का मंूग दाल हलवा बनाकर लाई है। लोगों के न होने से कुछ निश्चिंत होकर जतिन और रावी हलवा खा रहे थे। अपनी प्रशंसात्मक प्रतिक्रिया में जतिन ने रावी के दोनों हाथ अपने हाथों में थाम लिए। रावी के बालों को सहलाने के लिए वह उसके करीब आया ही था कि न जाने कहां से चंदेल सर प्रगट हो गए। आज दोनों रंगे हाथ पकड़े गए। जतिन हड़बड़ाहट में कुछ समझ ही नहीं पाया और रावी का हाथ थामे खड़ा रहा। रावी ने जल्दी से हाथ छुड़ाकर नजरें नीची कर लीं। चंदेल सर ने दोनांे में से किसी को कुछ भी नहीं कहा। ज़रा देर ठिठके और चले गए। एक तूफान गुजरा था पर एक बड़े तूफान की आशंका के साथ। रावी उसी समय घर चली गई और जतिन यही सोचता रहा कि किसी भी क्षण मित्तल सर का फोन आता ही होगा।
                सारी रात इसी उध्ेाड़बुन में निकल गई कि अब क्या होगा? क्या बीती होगी रावी पर। हालांकि शाम को रावी से कुछ देर बात करने पर जतिन ने जान लिया था कि घर पर कोई सवाल-जवाब नहीं हुआ पर हां घर की हवा को सामान्य नहीं कहा जा सकता था। मां को चाहकर भी नहीं बता पाया जतिन कि चिंता में अपनी सारी रात काली कर देगी मां। जतिन को बार-बार रावी के शब्द याद आ रहे थे-‘‘देर हो जाएगी जतिन।’’ और सचमुच देर हो गयी। चंदेल सर ज़रूर गए होंगे मित्तल सर के कान भरने। अब इतवार को अपराधी की तरह जाना पड़ेगा और दूसरी ही तरह बात संभालनी होगी। न चाहते हुए भी सारी स्थिति बिगड़ चुकी थी। सुबह स्कूल पहंचकर तो देखा रावी की कुर्सी खाली है। ज्यों - ज्यों समय गुजरता जतिन का मन घटने लगता। सवालों के अनगिनत जंगल और आंशका के स्याह बादल सामने दिखाई दे रहे थे। हिम्मत करके पफोन किया तो देर तक बजता रहा और किसी ने पफोन नहीं उठाया। अजीब बात ये भी थी कि चंदेल सर से भेंट हुई तो वो भी पहले की तरह ही मिले। चेहरे और बातों से कल की किसी नाराज़गी का कोई सुराग नहीं मिला। अब किससे पूछे जतिन रावी का हाल? ऐसे हालात में क्या संडे का इंतज़ार करे या निकल जाए अभी उसके घर के लिए। सारा दिन काम में मन नहीं लगा जतिन का। संजीव सर भी आज व्यस्त थे फिर निर्णय तो उसे खुद करना है- के ख्याल से जतिन दिन भर खुद से ही उलझता रहा।
                शाम के घिरते जाने पर आखिरकार उसने सोच ही लिया ‘‘बस अब नहीं। रावी की हालत जाने बिना आज घर जाना गुनाह है।’’ शाम को बिना इत्तला किए जतिन रावी के घर पहुंच गया। ‘‘जी, मैं जतिन हूं मित्तल सर घर पर हैं क्या?’’ सामने शायद रावी की मम्मी थीं। बिना किसी उत्सुकता के एकदम शांत जवाब मिला-‘‘नहीं घर पर नहीं हैं। कोई काम है?’’
‘‘जी मिलना था।’’
‘‘ठीक है बता दूंगी। फोन करके आना।’’ पानी पूछने और बिठाने की औपचारिकता पूरी किए बिना ये संवाद हुआ। इस दौरान जतिन की हर सांस रावी की आहट पाने की कोशिश करती रही। पर व्यर्थ। लगा जैसेे किसी गलत घर का दरवाजा खटखटा दिया है। चाहते हुए भी पूछ नहीं सका --‘‘रावी कहां है? कैसी है?’’
आज फिर रावी नहीं आई। जतिन का संदेह यकीन में बदल रहा था कि ज़रूर मारा-पीटा गया होगा। पिटाई के निशान और सूजी हुई आंखें लेकर कैसे आती स्कूल? रावी का फोन आज भी बजता ही रहा। दूसरे नंबरों से भी कोशिश की पर व्यर्थ। कई प्रयासों के बाद बिना एक पल गंवाए उसने मित्तल सर को फोन लगाया। सामान्य ढंग से हुई बातचीत में उन्होंने कल शाम का समय दिया। उनकी बातों से जतिन को किसी तूपफान की भनक नहीं लगी। मन को राहत पहुंची पर रावी से बात न हो पाना और उसका स्कूल न आना बहुत बुरा लग रहा था।
‘‘कैसे हो जतिन? उस दिन तुम आए...कहीं गया हुआ था...पर बता देते मुझे तो... ठहर जाता।’’
पानी पीते हुए जतिन को लगा एक वाक्य बोलने में इतनी जगह रुकना? पर फिर खुद को संयत किया कि मित्तल सर के लिए भी तो ये सब अजीब होगा। चाय आने तक भी रावी का पता नहीं था। जतिन को लग गया उसे रावी की गैरहाजि़री में ही बात करनी होगी जबकि रावी घर में ही मौजूद है।
‘‘ सर मैं और रावी चाहते हैं कि हमें आपका आशीर्वाद मिले...शादी के लिए।’’
बिना कोई सवाल किए, बिना हड़बड़ाए मित्तल सर ने कहा-‘‘मुझे अपने बड़ों से बात करनी होगी।’’
‘‘ पर आपको तो कोई एतराज़ नहीं हैं न सर?’’ अपनी बेचैनी पर काबू न पाते हुए जतिन के मुंह से निकल ही गया।
मित्तल सर जैसे तैयार थे इस सवाल के लिए-‘‘देखो जतिन इतनी जल्दी कुछ कह पाना मेरे लिए संभव नहीं। बहुत- सी बातें देखनी हांेगी अभी।’’
‘‘सर ...रावी...रावी से...’’
‘‘ रावी की मौसेरी बहन की शादी है । हाथ बंटाने के लिए उसे बुलाया है। गलती से मोबाइल भी यहीं छोड़ गई है।’’ आगे के सवाल का अंदेशा लगाकर जैसे मित्तल सर ने जवाब दिया। अब बेशर्म होकर मौसी के घर का पता और नंबर भी तो नहीं मांगा जा सकता । शंका होते हुए भी जतिन का मन कहा रहा था-‘‘पर सही भी तो हो सकता है जो कुछ उन्होंने कहा। मिले तो ढंग से ही। चाय-वाय भी पिलाई और गलत भी क्या कहा परिवार से बात तो करनी ही पड़ती है शादी-ब्याह के मामलों में। और बहन की शादी का जि़क्र तो रावी ने भी किया था। ’’ पर स्कूल को बिना इन्फाॅर्म किए जाना और बिना मोबाइल के जाना अखर रहा था जतिन को। तमाम हलचलों के बीच बस एक सुकून था कि आखिरकार अपनी बात कह पाया आज। संजीव सर ने भी हौसला बढ़ाया-‘‘जवान आधा काम तो कर ही आए हिम्मत से तुम। यकीन रखो सब ठीक होगा।’’ पिछले कुछ दिनों से चेहरे पर चस्पां तनाव की वक्र रेखाएं आज किसी हद तक स्थिर हुईं । रात को सोचा मां से कह दे सब पर रोक लिया कि अब अच्छी खबर ही सुनाएगा मां को। उस दिन देर तक गप्पबाजी हुई आज मां के साथ।
 ‘‘एक बात बताओ मां, सामने फ्रेम वाली तस्वीर में तुम पिताजी के साथ क्यों नहीं बैठी हो? वे बैठे हैं और तुम खड़ी हो?’’
‘‘ अरे अपने बराबर कभी बिठाया ही कहां रे उन्होंने।’’
‘‘ तुम जा बैठतीं... जगह तो खाली थी न उनकी बगल में।’’
‘‘ बात तो मन में जगह की थी न रे...चल तू बिठा लियो अपनी रावी को बगल में। वही फ्रेम लगा देंगे इसके बगल में, ऊपर बैठे-बैठे भी कुढ़ेंगे मुझसे।’’ इस बात पर दोनों देर तक हंसते रहे।
                जतिन के नसीब में आए राहत के पल रेत की मानिंद हाथ से फिसल गए। जीवन में एक अजीब अस्थिरता, असुरक्षा और अनिश्चितता ने घर कर लिया। सहज प्रेम की सुन्दर  कल्पनाएं बिखर रही थीं। रावी से कोई मुलाकात नहीं, बातचीत नहीं। कहीं कोई राह नहीं, दिशाएं सब उलझीं और अनुत्तरित। दिन हल्की- सी उम्मीद से शुरू तो होता पर एक बड़ी नाउम्मीदी पर उसे अकेला छोड़ जाता। दिमाग रावी को इतना याद करता कि अक्सर जतिन को लगता कि वह रावी की सूरत ही भूलता जा रहा है। ऐसे में स्कूल का काम उपेक्षित हो रहा था। किसी से बात करने की इच्छा भी नहीं होती थी। हरदम उसे लगता कि पीठ पीछे ही नहीं अब सामने भी मज़ाक उड़ाने में लोग संकोच नहीं कर रहे हैं। अक्सर उसके कान व्यंग्य बाणों के नुकीले प्रहारों से बिंध्े रहते और मन सोचता कि समाज किस हद तक असंवेदनशील है। इधर चंदेल सर ने तो इस विषय में उससे बात करने से साफ मना कर दिया। सब कुछ ठहरा, थमा और रुका हुआ था। और रावी जैसे वो कहीं थी ही नहीं। सपनों में रावी, जतिन को किसी तंग तहखाने में चीखती दिखाई देती। कई शाम दूर से उसके घर पर निगाह भी रखता था जतिन, पर सब व्यर्थ। सपनों से भरी एक लड़की इस शहर में गायब कर दी गई थी और कहीं कोई हलचल नहीं थी । सब अपने कामों में पहले की ही तरह व्यस्त थे। किसी को कोई चिंता ही नहीं थी। इस बीच जतिन थर्रा जाता, भाई और पिता द्वारा या रिश्तेदारों द्वारा जातिधर्म की रक्षा में अपने सपनों के आकाश में स्वतंत्रा उड़ने वाली लड़कियों के कत्ल की खबरों से। कई बार लगता कि गुपचुप उसकी शादी तो नहीं कर दी गई है। रावी पर किए अत्याचारों के बारे में सोचकर एक अपराध् बोध से रोज़ भरता जा रहा था जैसे। जतिन के पास सिर्फ इंतज़ार बचा था --एक लंबा इंतजार।
‘‘कैसे हो जतिन?’’
‘‘रावी तुम हो न? कहां हो रावी? कैसी हो?’’ भर्राए गले से जतिन के बोल पफूटे।
‘‘सब भूल जाओ जतिन। मैं अपने परिवार को कोई दुख नहीं पहुंचाना चाहती।’’
‘‘नहीं रावी। ये क्या कह रही हो? अच्छा एक बार मिल लो फिर बात करते हैं।’’
‘‘ नहीं जतिन....अब कभी नहीं।’’
‘‘नहीं रावी , रुको, सुनो तो...सुन रही हो न...बस एक बार हिम्मत करके आ जाओ मैं सब संभाल लूंगा रावी। बस एक बार। क्या इस दिन के लिए देखे थे हमने वो सपने? रावी मैं कह...।’’ बात पूरी हुए बगैर ही फोन कट गया या काट दिया गया। जतिन के अल्फाज़ कुछ देर सांस के साथ ध्ड़के फिर किसी अंधेरे में गुम होते चले गए। अब क्या होगा? यही सबसे बड़ा सवाल था। रावी के जिन्दा  होने की सूचना कितना कुछ खत्म होने के साथ मिल रही थी। कितना सपाट था रावी का स्वर। चिंताओं और तनाव के दुष्चक्र लगातार जतिन को अपनी गिरपफ्त में लेते जा रहे थे। अब क्या होगा?
‘‘रावी को आना ही चाहिए जतिन, चाहे कैसी भी परेशानी हो।’’ संजीव सर सब जानकर निर्णयात्मक ढंग से बोले। पर जतिन न सिर्फ रावी के अबोध मन का जानकार था बल्कि उसके द्वारा जीवन के बनाए गए सुरक्षित फ्रेम की भनक भी थी उसे ,जिसमें नानी-दादी और मां के जीवन- निष्कर्षों की तस्वीर जड़ी थी। ये तस्वीर काफी खुशहाल दीखती थी। जिसमें तीनों औरतें मजबूती से रावी का हाथ थामे हैं। संजीव सर को रावी को लेकर एक सख्त नाराज़गी थी पर जतिन रावी के असमंजस और उसकी पीड़ा को भी समझ पा रहा था। क्या रावी उस फ्रेम में उन तीन महिलाओं से झिटककर खड़ी अपनी दुखी तस्वीर की कल्पना से सिहर नहीं उठती होगी? कैसे उनसे अपना हाथ छुड़ा सकेगी रावी?
‘‘इतनी बच्ची भी नहीं है रावी। पैरों पर खड़ी है। समझदारी से काम ले और क्या प्यार करते समय इन खतरों के बारे में सोचा नहीं होगा उसने?’’ संजीव सर रौ में बोले चले जा रहे थे।
जतिन के बंधे होंठ भाषा  की हद से बाहर हो चले थे पर मन ज़ोर-ज़ोर से कह रहा था ‘‘ आप नहीं समझते सर रावी को। पैरों पर ज़रूर खड़ी है पर खड़ा करवाया है उसके पापा ने। उसकी मंजूरी  कहां थी? भले ही मुझसे प्यार करती है पर औरों के निर्णयों पर जीने की आदत है उसे। खुद को अकेले कैसे निकालेगी उस फ्रेम से? तस्वीर की अहमियत और उसमें रावी की सुरक्षित जगह की कितनी दुहाई दी गई होगी । वो तो मेरे ‘मैं सब ठीक कर दूंगा ’ जैसे चमत्कारिक शब्दोें में बंध्ी चल रही थी अब तक। अब जीवन के इस मोड़ पर उसे मेरे शब्दों का जादू भी बेअसर लग रहा होगा।
‘‘जिस समाज में रहती है क्या जानती नहीं कि प्रेम की क्या कीमत चुकानी पड़ती है? शादी से पहले धमकियां और हत्याएं। तरह-तरह के अत्याचार और शादी के बाद धोखे से बुलाकर लड़की को मारकर गाड़ देना और लड़के की लाश को उसके घर के आगे पफेंक देना। ’’ संजीव सर रावी की चुप्पी को अपनी तीखी प्रतिक्रिया से भर रहे थे।
‘‘ जानती क्यों नहीं है सर सब जानती है पर उसका मन? उसका क्या सर? मन नहीं मानना चाहता ये सब। मन तो उसका अपनी बहनों की तरह हंसी-खुशी विवाह करना चाहता है। ’’ जतिन के शब्द ज़ुबान पर आकर भी खामोश थे। वह खामोश और अकेला दोतरफा लड़ाई लड़ रहा था। अपनी और रावी के हिस्से की।
‘‘तुम्हारी चुप्पी को क्या समझूं जतिन? मित्तल सर भी झांसा  ही दे रहे हैं और क्या?’’
‘‘सर चुप कहां हूं, सब जानता हूं। पर मुझे रावी के आने का इंतज़ार है।’’
‘‘ और वो नहीं आई तो?’’ संजीव सर के सवाल ने जतिन को निरुत्तर कर दिया। पर रावी से फोन पर हुई बात ने जतिन को थोड़ी-सी आस बंधई थी कि रावी ज़रूर लौटेगी।
इधर रावी की लंबी गैरहाजि़री के चलते एक दिन जतिन के डेस्क पर प्रिंसीपल सर की ओर से भिजवाया गया नोटिस उसके साइन के लिए आया। पत्र में रावी के आने की अंतिम मियाद तय थी जिसके बाद उसकी सेवाएं समाप्त समझी जाएंगीं। सारे स्कूल में इस नोटिस को लेकर एक हलचल थी। सब लोग तमाशे की अगली कड़ी का बेसब्री से इंतज़ार करने लगे। नोटिस पर स्टैंप लगाकर अपने इनीश्यल करते हुए और वापिस प्रिंसीपल सर को भेजते हुए जतिन के मन ने कहा ‘‘अब रावी लौट आएगी। कितनी कोशिशों से लगी नौकरी को कोई क्यों ऐसे ही जाने देगा वो भी नौकरियों के अकाल के इस महाकाल में?’’ ये नोटिस जैसे जतिन की आशा का एकमात्र आधार बनकर उसके सामने था। उसे मां के शब्द याद आए ‘‘बेटा अच्छे दिन नहीं रहे तो देखना बुरे भी गुज़र जायेंगे।’’ इंतज़ार की घडि़यां एक बार पिफर से जतिन को रोमांचित करने लगीं। रावी की मेज़ से गुजरते हुए यों ही उसे दुलार से सहलाया जतिन ने। कुर्सी पर मुस्कुराती रावी नज़र आई। अचानक ही जतिन फिर से सब बातों-यादों को सहेजने लगा। फिर से सारे सपने अपनी मांगों को लेकर जतिन के सामने खड़े थे और जतिन एक बार फिर से उन्हें साकार करने के जोश में भर उठा था। वह जानता था कि रावी को तमाम हिदायतें देकर भेजा जाएगा। हो सकता है वो कुछ दिन बोले भी न , उसकी उपेक्षा करे । पर पिफर भी जतिन को भरोसा था कि  वो सब ठीक कर लेगा। शब्दों का जादू खुद से ध्ूाल झाड़कर वापिस लौट रहा था।
                स्कूल में आज बड़ी रौनक थी। सारा स्कूल आज बारात में तब्दील होने वाला था। शाम को हिस्ट्री वाले अनिल सर की बारात जानी थी। बहुत से लोग अनिल के घर से सारी रस्मों में शामिल होते हुए शादी की जगह पहुंचने वाले थे। प्रिंसीपल सर और जतिन को खासतौर पर इसके लिए निमंत्रित किया गया था। अनिल के घर बारात का हुडदंग मचा था पर प्रिंसीपल सर आज हमेशा की तरह हंस नहीं रहे थे। एक खिंची -सी मुस्कुराहट उनके चेहरे पर थी। कापफी पूछने के बाद उन्होंने जतिन को बताया-‘‘ बुरी खबर है जतिन... रावी का लिखित इस्तीपफा मिला है आज। किन्हीं व्यक्तिगत कारणों से वह यह नौकरी छोड़ना चाहती है।’’
‘‘सर आपने बात...’’ जतिन के अस्फुट से स्वर बाहर आने को पफड़पफड़ाए।
‘‘ मित्तल जी से बात हुई मेरी। संजीव ने भी समझाया पर उन्होंने तो सीध ही कह दिया-‘ यहां ही नहीं कहीं भी नहीं करवानी नौकरी इस लड़की से’... जतिन उनका फैसला पक्का है।’’
यानि रावी से उसके सपने ही नहीं आत्मनिर्भरता का अधिकार भी छिन गया जतिन के चलते। ये तो जतिन ने कभी नहीं चाहा था। कितना कुछ टूट रहा था उसके भीतर और कितना कुछ तोड़ा जा रहा था भीतर तक फिर भी जतिन की बाहर से सहज बने रहने की कोशिशें जारी थीं। अचानक वह भीड़ में एकदम अकेला महसूस कर रहा था। एक मशीनी तरीके से सेहराबंदी, घुड़चड़ी की रस्मों से जुडे़ हुए जतिन ने देखा सामने संजीव सर थे। लड़खड़ाते कदमों से उनके करीब गया और गले लगकर रोने लगा। सही जगह और मौका न होते हुए भी संजीव सर आज इस हरकत पर शांत थे। अपनी बाहों में कसकर जतिन को थामे थे और जतिन ढोल की तेज़ आवाज में अपनी बेसाख्ता रूलाई और दर्द को पूरा मौका दे रहा था। जतिन के रोने में उसके चीखते हुए सवाल शामिल थे-‘‘ मित्तल सर आपकी समस्या जात-बिरादरी है या बेटी के स्वतंत्र निर्णय?’’
नहीं इसके बाद भी जीवन खत्म नहीं हुआ। जतिन की नौकरी चलती रही पर रावी को जिंदादिल जिंदगी का तोहफा न दे पाने का दोषी खुद को मानते हुए उसने शादी नहीं की। मां की सारी साध मन में ही रह गई। बहू की मनमंजरी का खिलाना, पहनाना-घुमाना ही नहीं दीवार पर रावी-जतिन की साथ बैठे हुए खिंचने वाली तस्वीर का फ्रेम भी खाली ही रह गया। जतिन अक्सर खुद को सजा देता हुआ देर शाम या कभी अलस्सुबह पैदल लंबी दूरी तय करके जाता है रावी के घर तक और बिना उसे देखे लौट आता है। रावी से बिछड़े हुए आज पांच साल से अधिक बीत चुके हैं। चाहें तो इतना और जोड़ लें कि जतिन आज भी औरों की तरह रावी को उस सबका दोषी नहीं ठहराता। रावी को घर बिठा दिया गया है। कई साल गुज़र गए घरकैद में। उसकी छोटी बहन की शादी हो गई और शादी के लिए रावी की उम्र निकलती जा रही है। जतिन ने सुना, स्कूल में ही कोई कह रहा था कि ‘‘रावी भाई के बेटे को ऐसे संभाल रही है कि सगी मां भी क्या संभालेगी। बड़ी ही आज्ञाकारी और अच्छी लड़की है... ’’ एक बंधक आकाश के नीचे दूसरों की दी हुई बैसाखियों पर चलते, अपने टूटे-बिखरे सपनों को खुद से भी छिपाते , हरपल तस्वीर की रावी की रक्षा करती वह आज्ञाकारी और अच्छी लड़की नहीं तो और क्या है?


                                                                                                                                               
                                                                                                                               
                                                                                                                                 प्रज्ञा