एक ज़िन्दगी स्थगित
(कथाकार अरूण प्रकाश का स्मृति चित्र)
प्रज्ञा
लंबा कद, इकहरा बदन ,सांवला
रंग। बचपन से एक टांग में तकलीफ होने के कारण चाल का लंगड़ाना पर व्यक्तित्व में
गज़ब का आत्मविश्वास। आवाज तेज़ और एकदम साफ । दिलखोल हंसी जो तेज़ ठहाका भी थी और
खांसी से उखड़ जाए तो संभाले न संभले। मुस्कुराती, गहरी आंखें एक
समय में अपनेपन से सराबोर और दूसरे समय अजनबी को जांचती, चैकन्नी,
एकदम
सपाट, पूरे तौर पर भेदती हुई। मूंछों और दाड़ी से झांकते मोटे होंठों से
निकली भारी आवाज़ जो अपने देसीपन से सजी रहती हरदम। सादा पहनावा, शर्ट
हमेशा से पेंट से बाहर या फिर ढीला कुर्ता। पहली बार कथाकार अरूण प्रकाश को देखने
पर हर नया आदमी उन्हें हलके तौर पर नहीं ले सकता था। देर तक पीछा करती थी उनकी
जांचती-परखती मुद्रा और कुछ पूछ लें तो बात ही क्या?
बात 1992 की है। मैंने बी.ए. पास किया ही था कि
एक नई पत्रिका से जुड़ गई। यही सोचा कि नौकरियों के अकाल के युग में एक काम और सीख
लेंगे तो भविष्य में काम ही आएगा। पत्रिका थी-‘समय-सूत्रधार’ और मैं वहां बतौर ट्रेनी
काम करने लगी। श्री बद्रीनाथ तिवारी इस पत्रिका के संपादक थे। मैंने साहित्य में प्रथम श्रेणी पाई थी तो सोचा
पत्रकारिता में झंडे गाड़ देंगे पर जो काम वहां करने को मिले वह शुरू में भिश्ती
और बबर्ची के थे। डेस्क सेक्शन के दो हिस्से थे एक विशिष्ट और एक साधारण से भी
कमतर। जाहिर है विशिष्ट हिस्सा उस समय हमारे लिए जगमगाते सितारों से कम नहीं था
जिन्हें हम उचक कर और बड़े सम्मान से देखते। अरूण प्रकाश, असद जैदी उस समय,
उस
पत्रिका के धूमकेतु थे। अखिलेश, अनिल चमडि़या, मंजरी चतुर्वेदी,
अरूण
तिवारी, अमिताभ आदि की टीम के साथ हम जैसे भी अनेक थे। अरूण जी को मैं तब एक कहानीकार के रूप में ही
जानती थी। तब तक ‘भैया एक्सप्रेस’ और ‘जल प्रांतर’ संग्रह की कहानियां पढ़ चुकी
थी। आर्थिक मुद्दों पर पैनी नज़र रखने
वाले गंभीर विचारक के रूप में उन्हें यहीं आकर जाना। इस पाक्षिक पत्रिका के लिए नियमित
तौर पर जाने वाला कॉलम ‘अर्थ-अनर्थ’ वही लिखा करते थे। इस कॉलम में देश-विदेश से
जुड़े नई आर्थिक योजनाओं के मुद्दों, नए उद्योग, नई वैश्विक नीतियों,
शेयर
बाजार की खबरें, मुद्रा स्फीति, मंहगाई ,
राज्यों
से जुड़ी आर्थिक खबरें शामिल हुआ करती थीं। तब भूमंडलीकरण की बयार बहनी शुरू हुई
थी तो उदारीकरण, निजीकरण के मुद्दे भी शामिल रहा करते।
ग्यारह-बारह खबरों के इस पाक्षिक स्तंभ के शीर्षक हांलाकि सरल हुआ करते पर पाठक का
ध्यान खींचने वाले होते। एक तो मुझे अब तक भी याद है-‘हर्षद सुसमाचार’। इसी तरह
उनके लेखन में शैली की व्यंग्यात्मक धार भी थी। ग्लोबलाइज़ेशन के चरण में उनकी
लिखी इस पंक्ति पर गौर किया जा सकता है-‘‘आजकल जो भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर से नीचे
है पिछड़ा है।’’
मेरा नाता चूंकि साधारण डेस्क से था तो
कभी-कभार लिखने के काम के अलावा अखबारों की खास कटिंग, फाइलिंग जैसे
काम भी हम तीन ट्रेनीज़ के हिस्से में ही थे। फिर प्रूफ रीडिंग जैसे कामों की कमी
भी नहीं थी। मुझे याद है कि एक दिन हमारे हिस्से में आकर उन्होंने देखा मैं कागजों
में झुकी हुई हूं-‘‘ क्या कर रही हो जरा दिखाओ तो?’’ बेहद
आत्मविश्वास से करती जा रही थी मैं अपना काम। उस एक सवाल ने सारा शिराज़ा बिखेर
दिया। मैंने सकुचाते हुए प्रूफ की कॉपी उनके आगे कर दी। बेहद बारीकी से उन्होंने देखा।
मेरी सांसें अटकी रहीं जब तक उनकी आंखें कागज़ पर गड़ी रहीं। थोड़ी देर में
उन्होंने सिर हिलाकर कागज़ मुझे लौटा दिए। एक शब्द नहीं कहा। पर मेरे साथियों ने
बाद में मुझे समझा दिया कि अरूण जी ने अगर बिना बोले कॉपी लौटा दी तो समझो पास हो। मुझमें आत्मविश्वास
थोड़ा बढ़ गया था और उसके बाद मेरी कोशिश रहती कुछ अच्छा करूं और अरूण जी उसे
देखें।
एक
दिन की बात है सहज और बेलाग छवि वाले अरूण प्रकाश जी ने अपने डेस्क से उठकर घोषणा
की-‘‘ कौन सीखना चाहेगा आर्थिक क्षेत्र के मुद्दों पर लिखना ?’’ इससे
पहले कि बाकी लोग ध्यान देते कुछ उत्साही साधारण से विशिष्ट डेस्क क्षेत्र की ओर
बढ़ चले अपनी सेवाएं उन्हें देने के लिए। जैसे ही उन्होंने पूरी ईमानदारी से काम
सीखने का प्रस्ताव रखा और बाकी लोग रेस में पिछड़ जाने के एहसास से कमतरी महसूस
करने लगे अरूण जी ने अपनी बात पूरी की-‘‘ ...बस शर्त ये है कि बी.ए. तक इकोनॉमिक्स विषय से पढ़ाई की
हो।’’ एक क्षण के मौन के बाद ताली पीटकर दिलखोल हंसी ने सारा माहौल ही बदल दिया।
अति उत्साह में उनकी तरफ उछलते- कूदते गए लोग जहां हिम्मतपस्त हो निराश कदमों से
लौटे वहां पूरे ऑफिस में उनकी वाक्पटुता
से हास्य का माहौल बन गया और एक आदमी नहीं मिला जो उनके बराबर सोचने की भी हिम्मत कर
सके। उनकी हाजि़रजवाबी और जिंदादिली निराली थी।
अक्सर
देखती अपना काम बेहद गंभीरता से करते और काम के दौरान चाय और सिगरेट का दौर कभी न
थमता। वो चेन स्मोकर थे। उनसे मिलने आने वाले भी कम न थे। शाम के समय कोई न कोई आ
ही जाता उनसे मिलने और वो अक्सर उन्ही के साथ निकल जाते। मैं देखती कभी प्रयाग
शुक्ल, कभी राजकिशोर, सुरेश सलिल कभी अखिलेश जी उनके पास
बैठे होते और बेतकल्लुफी के आलम में खूब गप करते। अक्सर इन गप्पों का रूप बहस की
ओर बढ़ जाता और वक्ताओं का स्वर भी तेज हो जाता। पत्रिका चूंकि पाक्षिक थी इसलिए
काम की कमी न थी। वे नियमित आते, खूब काम करते और पसंद के लोगों से खूब
बतियाते। पसंद न आने वालों से भी उनका स्वभाव बुरा न था पर अपनी बातों से वे
उन्हें धकेल देते। कई जगह नौकरी करने के कारण
उनके कोष में ढेर सारे किस्से थे और किस्सागोई तो फितरत में थी ही। कई बार
काम हो जाने के बाद कोई न कोई किस्सा ज़रूर साझा किया करते। साहित्यिक, राजनीतिक
किस्सों का भंडार था उनके पास, कितने आंदोलनों से जुड़े किस्से भी और
उन किस्सों को कहते हुए गंभीर शैली और बेखौफ हास्य दोनों अपने समूचे अस्तित्व के
साथ शामिल रहते। कुछ दिन बाद मुझे असद जी
की टीम में काम करने का अवसर मिला। कभी फीचर-लेखन तो कभी रिर्पोटिंग जैसा काम और
मैंने बाइलाइन छपना शुरू किया तो उस समय के मेरे अपरिपक्व़ लेखन को भी उन्होंने
प्रोत्साहन दिया। ‘काम करते चलो बस’ जिसे कई बार शब्दों में तो कभी अंाख के इशारे
से वे मुझे समझाते रहे। कभी-कभी मैं उनकी कहानियों पर भी उनसे बतिया लेती अपनी
क्षमता भर और वो आत्मीय मुद्रा में इत्मीनान से बात किया करते। पिताजी के माध्यम
से पहले से उनसे परिचित होते हुए भी उस
पत्रिका में काम करने के दौरान मेरा उनसे नया और स्थायी परिचय बना। मेरे लिए वो
अरूण प्रकाश अंकल तो जीवन भर रहे पर साहित्यकार और पत्रकार अरूण प्रकाश को मैंने
यहीं आकर जाना। मुझे लगता है उन्होंने भी ठीक इसी तरह मुझे बिटिया नहीं सहकर्मी के
रूप में अधिक जाना होगा।
साल
भर निकलने के बाद पत्रिका अपने आर्थिक-राजनीतिक कारणों से बंद होने पर आ गई। कितने
ही लोग निराश हो रहे थे। पत्रकारिता के क्षेत्र के इस अस्थायित्व को मैंने उसी समय
बेहद नज़दीक से देखा। मेरे जैसे लोगों के पास तो फिर भी रोज़गार की दिशा और
क्षेत्र बदलने का विकल्प था पर बहुत से लोग जो अब यहां से कहीं भी नहीं जा सकते थे
काफी चिंतित थे। पत्रकार यूनियन की बैठकें, पत्रिका का
गवहाटी में स्थानांतरण(जो केवल बहाना था पत्रिका बंद करने का), लोगों
के तबादले से जुड़े पत्रों के बीच अरूण जी जैसे वरिष्ठ पत्रकारों के सहयोग से सभी
लोगों को अचानक पत्रिका बंद किए जाने का मुआवज़ा मिल पाया जिससे अगली नौकरी ढूंढने
तक छोटा ही सही आर्थिक आधार बना रहे।
पत्रिका
के खत्म होने के बाद मैं आगे की पढ़ाई में व्यस्त हो गई। अपने पत्रकार दोस्तों से
सबके हाल-चाल मिलते रहते। अरूण प्रकाश जी से मिलने का ठप्प हो चला सिलसिला फिर से
राह पर आया जब दिल्ली विश्वविद्यालय में मेरी नौकरी और विवाह के बाद पिताजी ने
‘कथन’ पत्रिका का पुनर्प्रकाशन आरंभ किया।
अरूण प्रकाश जी की पहली कहानी ‘कहानी नहीं’ ‘कथन’ के शुरूआती दौर में निकली थी
जिसे पढ़कर पाठक सन्न रह जाए । शोषण के विरोध में शोषित के साथ अपनी पूरी
सहानुभूति और परिवर्तन की मांग के दृढ़ संकल्प के साथ खड़ा हो जाए। प्रेमचंद के
रचनात्मक सरोकारों से जुड़े और प्रेमचंद की कथा परंपरा से जुड़े रचनाकारों में थे
अरूण प्रकाश। ‘कथन’ के वार्षिक कार्यक्रमों में , घर में हुई
गोष्ठियों में उनसे मिलना होने लगा। एक दिन पिताजी का फोन आया कि अरूण घर आ रहे
हैं अपनी लंबी कहानी सुनाने। हम लोग तुरंत पश्चिम विहार पिताजी के घर पहुंचे और उस
दिन उनकी लंबी कहानी ‘गज पुराण’ का पाठ और उस पर चर्चा भी हुई। यह कहानी पुराणों
की तर्ज पर ठेठ कटु यथार्थ में रची-बसी थी और उनकी कुछ और कहानियों की तरह गांव से
शहर में विस्थापित होते आम आदमी के सपनों और आकांक्षाओं के टूटने की कहानी थी।
उन्होंने मस्तान नामक हाथी की जीवन कथा के जरिए देश- समाज में आ रहे विभिन्न
बदलावों को रेखांकित किया था। पुराने सामंतवाद से नए पूंजीवाद तक का फलक था इस
कहानी का।कहानी अपने संपूर्ण प्रभाव में तो याद रही ही पाठ के दौरान मस्तान के
मालिक पुत्तू का हाथी को इशारा से पुकारना ‘दच्चे-दच्चे’ मुझे आज तक नहीं भूला। इस
बार अरूण जी से संबंधों की कड़ी कुछ और पुख्ता हुई। मेरे पति (मित्र कहना अधिक
मुनासिब होगा) से और बाद में बिटिया से भी उनका नाता जुड़ा।
सन्
2004 में आया उनका पांचवां कहानी संग्रह ‘विषम राग’ उन्होंने हमें भेंट
किया। राकेश ने उसकी लंबी समीक्षा की जो ‘वसुधा’ के सितम्बर अंक में प्रकाशित हुई।
ये समीक्षात्मक लेख दरअसल संग्रह की कहानियों के जरिए उनकी संपूर्ण कथा-यात्रा पर
केंद्रित था। उन्हें समीक्षा अच्छी लगी हांलाकि सामने तारीफ करना उनकी फितरत में
नहीं था। तारीफ का पक्ष उजागर हुआ उनके फोन से ‘‘प्रज्ञा तुम्हारे घर आ रहा हूं।
मेट्रो से आऊंगा, आगे का रास्ता नहीं मालूम, राकेस
को कहो कि मुझे वहां से ले जाए।’’ याद है मुझे भयानक गरमी थी। जून का महीना था। पर
उनके आते ही घर में रौनक- सी आ गई। दिलशाद गार्डन से रोहिणी आना ऐसी गरमी में उनके
लिए कष्टप्रद ही रहा होगा। नाश्ता हम सबने साथ किया। मैंने पूरी और सब्जी बनाए थे
उस दिन। नाश्ता करने के बाद वे मुझे
संतुष्ट लगे। उन्होंने कहा-‘‘तुम्हें आता है ये सब बनाना?’’ मैंने सोचा
उन्हें यही लगता रहा होगा कि भागदौड़ भरे जीवन में रसोई मुझसे विलग होगी। उनकी
सहजता की कायल शायद मैं सबसे अधिक उसी दिन हुई थी। यही वजह है पूरी घटना मुझे याद
रह गई। दोपहर में जब खाने की बारी आई तो मैंने पूछा आप क्या खाना पसंद करेंगे और
उन्होंने कहा-‘‘दाल-चावल ठीक हैं...और सुबह की सब्जी बची है न?’’ बिटिया
ने कहा मुझे मटन खाना है। इस पर वे बोले-‘‘मटन बनाया है क्या?’’ मटन
रात का बचा था बताने पर उन्होंने भी बिटिया की ही तरह आग्रह किया ‘‘ मैं भी लूंगा
जरूर।’’
उस
दिन एक और अरूण प्रकाश से भी उन्होंने मिलवा दिया। सुबह से शाम तक पूरे इत्मीनान
से हमारे घर रहे वो। खूब साहित्यिक चर्चाएं, कितने जीवनानुभव,
आलोचना
और उपलब्धियों के दौर, हमारी किताबों को देखना और किताबों के संग्रह
में बरती जाने वाली सावधानियों की चर्चा। पर मजाल है इस सबके बीच मेरी तुतलाती
बिटिया को उन्होंने ज़रा- सा भी नज़रअंदाज किया हो। पहली ही मुलाकात में उससे खूब
दोस्ती गांठ ली उन्होंने। उसकी कविताएं-गीत सुनने से लेकर खेलों का हिस्सा भी बने।
जल्दी ही उनसे घुलमिल जाने के कारण वह उत्साहित होकर उन्हें अपने तमाम करतबों में
शामिल कर लेना चाहती थी-नाना आपको साड़ी पहनके दिखाऊं? आप बाल खेलेंगे
मेरे साथ? और वो बिना हिचक उसकी सारी गतिविधियों में शामिल होते चले गए। सूरज
ढलने तक चाय के अनगिनत दौर चले। उसके बाद
उन्हें पिताजी के घर जाना था। ‘‘चलूं प्रज्ञा, भाईसाहब से भी
मिलना है।’’ हमेशा उन्होंने पिताजी को यही सम्बोधन दिया।
सन्
2006 की बात है पिताजी के जन्मदिन, पहली मार्च को
शब्दसंधान प्रकाशन से आई उनकी नई किताब ‘डाक्यूड्रामा तथा अन्य कहानियां’ पर
साहित्य अकादमी सभागार में एक वैचारिक गोष्ठी का आयोजन किया गया। इसके वक्ताओं में
रंगकर्मी और नाट्य चिंतक देवेंद्रराज अंकुर, नंद भारद्वाज,
जबरीमल्ल
पारख, अजय तिवारी के साथ अरूण प्रकाश भी शामिल थे और कार्यक्रम की
अध्यक्षता की थी प्रो. नित्यानंद तिवारी ने। इस कार्यक्रम के संचालन का मौका मुझे
मिला था। कथाकार अरूण प्रकाश कथा समीक्षा और आलोचनात्मक लेखन से लंबे अर्से से
जुड़े रहे थे। मुझे याद है उस पूरे कार्यक्रम में एक उन्होंने ही अपनी सारी बात
कहानियों के शिल्प के हवाले से की थी। कथा-शिल्प की बारिकियों की उन्हें जबरदस्त
पकड़ थी। बाद में इस कार्यक्रम को परिचर्चा के रूप में ‘कथन’ में प्रकाशित भी किया
गया था।
फिर
अरूण जी समकालीन भारतीय साहित्य के संपादक हो गए। बधाई तो फोन पर दे दी थी बाद में
उनके ऑफिस जाना भी हुआ। व्यस्त होते भी
उसी जिंदादिली से उन्होंने स्वागत किया। चाय पिलाई। उनकी टेबल पर किताबों का अंबार
लगा था और उन्हें समेटने की कोई चिंता उन्हें नहीं थी। उस दृश्य को देखकर लग रहा
था कि अरूण जी अपनी बेफिक्री वाली शैली में दो टूक यही कहेंगे ‘‘अरे बैठे हैं अपने
प्रिय के साथ ज़रा इत्मीनान से और क्या?’’ अति व्यवस्थित होने की उन्होंने कभी
परवाह नहीं की। एक दिन उनकी ओर से एक संदेश, एक किताब के साथ
आया। किताब एक भारतीय मूल की लेखिका की थी जो नाइजीरिया में जा बसी थीं। लेखिका
थीं शशि महाजन और उनकी किताब-‘खुली खिड़की से’। अरूण जी ने कहा किताब पर एक
समीक्षात्मक पर्चा लिखना है तुम्हें। दिन बताया और समय। उस गोष्ठी की अध्यक्षता
कथाकार सेरा यात्री जी ने की थी और वक्ताओं में राजकुमार सैनी, गुणाकर
मुले, पद्मा सचदेव और मैं शामिल थे। सामने श्रोताओं की दूसरी पंक्ति में
पूरे समय बैठे रहे अरूण जी। नाइजीरिया के सामाजिक-राजनीतिक अंतर्विरोधों के बीच
भारतीय नायक-नायिका के जीवन की बानगी, अपराध तंत्र, पितृसत्ता के
दमन की शिकार महिलाओं का संगठित होना जैसे मुद्दों पर आधारित मेरा पर्चा एक तरह से
विषय प्रवेश भी था और उपन्यास की समीक्षा भी। कार्यक्रम के दौरान अपने अध्यक्षीय
भाषण में सेरा यात्री जी ने पर्चे की प्रशंसा की तब मैं मंच से अरूण प्रकाश जी की
भाव-भंगिमा पर गौर कर रही थी। मैंने पाया उनके आंखों का भाव यात्री जी के कथन से
भिन्न न था। कार्यक्रम के बाद प्रकाशक अशोक माहेश्वरी की बेटी की शादी में वो हम
लोगों के साथ ही गए। रास्ते में गंभीर चर्चा से लेकर हंसी-मजाक सब शामिल रहा। उम्र
में उनसे बहुत छोटा होने के कारण वो अधिकारपूर्वक हमें डांट-डपट भी लिया करते थे
और मित्रवत व्यवहार तो रखते ही थे।
एक
सक्रिय जीवन जीते हुए, रचना और रचनात्मक सरोकारों से जूझते हुए भी
अंततः उनकी दमे की समस्या बढ़ती गई। पहले फोन पर बात हो भी जाती थी फिर उनका बोलना
कम हुआ या बीमारी के चलते कम कर दिया गया। पहले भी खांसी के लंबे दौर बड़ी देर में
ही थमा करते थे। इस कदर भयानक कि सामने वाला सिहर जाए पर अरूण प्रकाश जी खांसी के
थमते ही वापिस उसी बात पर आ जाते जहां से उन्होंने बात खत्म की होती। शमशेर की
पंक्ति-‘‘काल तुझसे होड़ मेरी’’ जैसे यही उनके जीवन की केंद्रीय भूमि रही । और
धीरे-धीरे लंबी बीमारी के बाद वो अपना रचना -संसार, पाठक समाज को
सौंपकर एक दिन विदा हो गए।
आज के विषम यथार्थ में उनकी जनपक्षधर कहानियां यथास्थितिवाद के विरोध और
विकल्प के रूप में जीवित हैं और रहेंगी। मनुष्य विरोधी सत्ता की आलोचना की कहानियां
और मनुष्य के संघर्ष की कहानियां, उनकी बेसाख्ता हंसी, दोस्ती
के असीम दायरे, चेहरे के कोणों से जाहिर होती गंभीर और सख्त
मुद्रा और पारखी आंखें, ये सब क्या कभी भुला सकती हूं मैं? जीवन
की गति मौत के बाद भी थमती नहीं। मृत्यु अपने साथ एक अवसाद, एक पीड़ा और एक
बड़ा स्मृति-संसार छोड़ के जाती है। यह स्मृति ही वो कड़ी है जो मृत्यु के बाद भी
बहुत कुछ जिलाए रखती है। ऐसा बहुत कुछ जो खत्म नहीं हो सकता। अरूण प्रकाश जी मेरी
उसी स्मृति का स्थाई हिस्सा हैं जिन्हें मैंने अपने जीवन में अर्जित किया। उनकी एक
कहानी का शीर्षक है-‘एक जिंदगी स्थगित’, हालांकि कहानी का संदर्भ अलग है पर यदि
इस शीर्षक को उनकी स्मृति पर आरोपित किया जाए तो यही लगता है कि जिंदगी खत्म नहीं
हुई वह स्थगित हुई है और फिर शुरू होगी। उनकी रचनाओं, उनके किरदारों
में वह जिंदगी आगे बढ़ती रहेगी। स्मृतियों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराते कथाकार,
पत्रकार,
चिंतक
और रचनात्मक परिवार के आदरणीय अरूण प्रकाश जी संसार से रूखसत होने के बाद एक मंच
पर आज भी मौजूद हैं। मेरे साथ हैं। आभासी
दुनिया के जरिए उन्होंने फेसबुक जैसे माध्यम से
खुद को व्यापक समाज से जोड़ा था। आज उनके गुजरने के बाद भी वे मेरी मित्र
सूची में हैं। फेसबुक पर उनके अकांउट में पोस्ट किए उनके अनेक चित्रों को देखकर,
उनकी
उपस्थिति महसूस करके इतना जरूर जान पाई हूं कि आभासी दुनिया भी कई बार यथार्थ से
बड़ी कैसे हो जाती है।