रविवार, 6 अक्टूबर 2013

मुंहबोले नाना

          
                  
                          मुंहबोले नाना                
                                                             
  दिल्ली जैसे महानगरो में अंकल, आंटी जैसे सम्बोधनों का धड़ल्ले से प्रयोग किया जाता है। बहुत सारे लोग इस पर नाक-भौं भी सिकोड़ते हैं। आत्मीयता, अपनत्व, करीबीपन की दुहाई देने वाले और मुंहबोले संबंधों की वकालत करने वाले कुछ और माने न माने ये तो मानेंगे कि आज के समय में अंकल-आंटी समानतामूलक शब्द हैं। रिश्तेदार, पास-पड़ोसी से लेकर घर के कामों में सहयोग देने वाला प्रत्येक व्यक्ति-कामवाली माई, गाड़ी साफ करने वाला, कपड़े प्रैस करने वाला, कूड़ा उठाने वाला, दुकानदार यानी प्रत्येक व्यक्ति अंकल या आंटी कहलाता है। हर उम्र, वर्ग, लिंग यहां तक कि जाति और धर्म के आधार पर ये सम्बोधन समाज में समानता का डंका पीट रहे हैं।
मुझे याद है बचपन में जिस किराए के मकान में हम रहते थे उसके तीन हिस्सों में रहने वाले छोटे-बड़े परिवारों में कोई भी हमारा अंकल-आंटी नहीं था। मां किसी को मौसाजी-मौसी बुलातीं, किसी को माताजी-पिताजी और कोई भाभीजी-भाईसाहब था। मां द्वारा प्रयुक्त किए जाने वाले सम्बोधन हमें उसी रूप में ही रिश्तों में बांध लेते। नानाजी, नानीजी,मामा-मामी, मौसी-मौसाजी जैसे सम्बोधन बड़े ही स्वाभाविक रूप से ज़बान पर चले आते। जितनी सहजता मौखिक रूप से थी उतनी ही व्यवहार में भी थी। उनसे जितना प्रेम मिलता तो बहुत बार डांट भी पड़ती लेकिन मां-पिताजी यही समझाते कि प्यार करते हैं तो डांटेंगे भी। मां के स्वभाव की सरलता, सहजता और सहनशीलता के गुणों ने इन सम्बंधों को अर्जित किया था। बेशक हमारे नाना-नानी दिल्ली में नहीं रहते थे पर उनके अभाव को मां ने पूरा करते हुए कई मौसी, मामा और नाना-नानी के कुनबे से भर दिया था। मां-पिताजी ने इन सम्बंधों को सींचा, उन्हें सहेजा और यथासंभव निभाया। आज उनमें से बहुत सारे लोग जीवित भी नहीं हैं फिर भी उनकी अगली पीढ़ी से बातचीत बनी हुई है ।
मां का यह गुण विरासत में हम भाई-बहनों में अनायास चला आया। आज मेरी बेटी के भी कई चाचा-ताउ, मामा-मौसी, बुआ-फूफा,नाना-नानी हैं। और भाई-बहन की तो कोई गिनती ही नहीं है। बचपन में पड़ी इस आदत को दो-तीन महीनों के भीतर दो धारदार झटके लगे। पड़ोस में रहने वाला एक परिवार हमारी बच्ची के इतना नज़दीक आ गया कि अब उन उम्रदराज़ महिला और उनके इकलौते बेटे को अंकल-आंटी कहना खुद मुझे अटपटा लगने लगा। एक दिन बातचीत के दौरान महिला ने बताया कि जल्द ही उनके पोते का पहला जन्मदिन होने को है और हमें उस दौरान आयोजन में उपस्थित ही नहीं रहना होगा बल्कि उनकी मदद भी करनी होगी। उपयुक्त मौका देखकर मैंने बिटिया से उनके बेटे को मामा कहकर और उन्हें नानी कहकर पुकारने को कहा। अभी बिटिया के शब्द भी होंठों से न निकले थे कि उस नौजवान ने कहा मैं मामा नहीं चाचा कहलवाउंगा गुड़िया से। ‘हां भई! मैं तो दादी बनूंगी इसकी’ लड़के की बात को पूरा करते हुए  बुजुर्ग महिला ने जो दादी बनने का ‘सौभाग्य’ पहले ही प्राप्त कर चुकीं थीं, उसकी बात का समर्थन करते हुए कथन को  सत्यापित कर दिया।  
दूसरी घटना कुछ दिन पहले ही घटी। एक परिचित जो अक्सर हमारे घर कहानी-उपन्यास लेने आया करते थे और उन पर हमसे अच्छी-खासी चर्चा भी किया करते थे, उन्होंने एक दिन दिल्ली की संवेदनशून्यता की ओर बातचीत का रुख मोड़ दिया। इस चर्चा का पहला निशाना बना अंकल-आंटी संबोधन। चर्चा लंबी चली और लब्बोलुआब ये निकला कि हमेशा उन्हें अंकल कहती आई मैंने रुखसत के समय बेटी से कहा ‘नाना को नमस्ते करो’ । इधर उसने नमस्कार किया ही था कि उन सज्जन ने थोड़ा अटकते हुए पर सभ्य बने रहने के अंदाज़ में स्पष्ट किया ‘नाना नहीं दादा ठीक रहेगा।’ बिटिया तो उसमें  भी अपनी खुशी ढूंढकर खेल में लग गई पर हम पति-पत्नी हतप्रभ थे कि सहज रूप से कहे गए ये शब्द अर्थ की कितनी मारक अभिव्यंजना रखते हैं। दोनों घटनाएं एक ही सच को सामने ला रहीं थीं कि स्त्री को मातृशक्ति, देवी कहने वाला समाज कितना खोखला और साहसहीन है। 
घटनाओं से संबंधित सभी किरदार प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पितृ पक्ष के संबंध निभाने को ही आतुर दिखे। हों भी क्यों नहीं, मातृ पक्ष के संबंधों को निभाकर समाज में नीचा दर्जा क्यों स्वीकार करें। इस पक्ष में खड़े होकर मिलेगा भी क्या? न तो इसमें समाज के ताकतवर माने जाने वाले धड़े का सम्मान है न ही सामाजिक प्रतिष्ठा। यहां न ताकत है न ओहदा और न ही अधिकारों का दंभ। नाना-नानी,मामा-मौसी जैसे मुंहबोले संबंधों को निभाकर दायित्वों की आजीवन चक्की कौन पीसेगा? इन घटनाओं के घटने के बाद तो ऐसा लगता है कि कन्या भू्रण हत्या, बलात्कार, दहेज और कई और तरीकों से किये गये स्त्री-उत्पीड़न का खुला सच आज इतने निर्मम रूप में दीख रहा है कि लोग पितृसत्ता के मद मे मुंहबोले संबंधों में भी मातृपक्ष के प्रति असंवेदनशील हैं। और ये हाल तो तब है जब महानगर की भागमभाग भरी ज़िन्दगी लोगों को इत्मीनान से न तो समय बिताने की छूट देती है न सलीके से संबंधों को निभाने का अवकाश।        













   

                   


























          

                  

























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